दो शब्द

अमृतेय बुद्ध

यह, मानव संवेदनाओं संपोषित एक विश्व-चेतना का काव्य है. जड़, जंगम, खगचार, भूचर कौन ममत्व के गहन बंधनों में आबद्ध नहीं होता है. किसी के समीप भावोद्रेक के गहन स्रोत होते हैं, किसी की वाणी अपनी सीमा में बल खाती अबूझ होती है.
किन्तु. वेदना का अपार लहराता पारावार किनारों को आद्र बनाता, जीवन को रस सिंचित करता रहता है.
भाव प्रवणता , ह्रदय की थाति है. कौन उसे कैसे संजोता, संवारता है.
प्रभु की करुणामय वात्सल्यपूर्ण शीतल स्नेहिल छाया में उनके परम पावन चरणों के नीचे लिखा गया यह दार्शनिक पृष्ठभूमि में सामाजिक विषमता, वेदना, पीड़ा, अंतर्द्वंदों का मार्मिक काव्य है.
दुःख के प्रज्वलित अलातचक्र में बंदी मानव !
शाश्वत सुख की ओर भागा.
वह आनंद . जो अक्षुण्ण हो. चिरंतन हो.
किन्तु तलाश ! 
तलाश तो तलाश ही है.
वह अनन्त है. उसकी विधा अनन्त है.
सांत, अनन्त की भाषा क्या जाने.
वह तो मात्र अंतरतम की अतल अनूभुतियों से ही तो उसे वाणी में चित्रित कर सकता है.
यह सुख. यह सत्य.
शाश्वत आनंद .
आघातों के ज्वार संकुलित घूर्णित कलडंकुरों से, अतल गहराईओं में उतरता, प्रत्येक संवेदनाओं को अवगाहन करता मानव, मात्र अनुभूतियों के आवेगों से दोलित उनमे ही अवतरित, संतरित होता रहता है.
क्या है आनंद ?
दुःख की छाया. जिसमे कोई स्फूरण नहीं.
यह, निर्विकार निस्पृह क्षेत्र ही, संभव है, शाश्वत चिरंतन आनंद है.
इस आनंद की अनुभूति बीतराग को ही प्राप्त है.
आशा, अभिलाषाओं के सुरभित किंजल्क जाल में मरंद मीलित आकुलित मनः-षट्पद इसे जान भी नहीं सकता.
किन्तु !
अप्राप्ति की पीड़ा !
चाहे वह लौकिक हो या पारलौकिक.
उसे तो वह अनुभव कर ही सकता है.
क्योंकि,
बंधन सदा उन्मुक्ति के निमित्त चिर अधीर और प्रतीक्षित है.
इसलिए,
सिद्धार्थ !
दुख के भंवर चक्र से निष्क्रमण कर घोर आनंद की गवेषणा में अग्रसर हुए.
प्रेरक दुःख ही था.
पीड़ा ही थी.
रूप विपर्यय का कटु विलास ता.
सुखों की शीतल मादक छाँव.
उषा क्या जाने. और यदि आंच लगी भी,
तो वह ! शान्त कैसे रहे.
शाश्वत आनंद अमृत रस की ऊर्ध्वमुखी निरंतर यात्रा.
एक पर एक क्रम्बध्ह दुखों की वृत्तियों का क्रमशः भंजन.
प्रभु ने शनैः शनैः वह किया.
जिसे कोई भी , एकनिष्ठ अचंचल मानव कर सकता था.
अमृत !
जिस अमृत को प्रभु ने प्राप्त किया.
वह,
जन साधारण को भी सुगमता से प्राप्त हो सकता था.
किन्तु मनः-वृत्तियों का शमन. नितांत दुष्कर.
लालसाओं की मोहता.
म्मारका.
अजेय था वह सौदर्य शौष्ठव का पल-पल रूपायित संसार.
यह साधारण आत्मबल से विजित होना नितांत दुस्तर था.
महामानव ने वह सब किया.

जो मोक्ष निर्वाण तक ले जाता था.
वहाँ. मन को, निरावरण निष्कल अचल होना था.
किन्तु, यह सबके वश का नहीं था.
जिसने किया, वे, अमृत पद को प्राप्त हुए.
मन और समाज की किन जटिलताओं को प्रभु ने पार किया. कितने ऊंचे-नीचे स्थल का, पीड़ाओं, अंतर्द्वंद्वों, मतभेदों, आडम्बरों को उन्होंने निःसंग चुनौती दी. आडम्बरों का, धार्मिक जतिल्तायों का भंजन किया. सत्य का प्रज्वलन किया.
आत्मा !
इस पर मौन रहे .
इसलिए नहीं कि इसका ज्ञान या अनुभव नहीं था. जो जिस भूमि पर अवस्थित होता है वह निश्चय ही उसकी धडकनों का अवगाहन करता है. वेदान्त की दार्शनिक भूमि पर खड़ा मानव निष्ठाओं के प्रतीक देवी-देवताओं को भले ही अस्वीकार कर दे किन्तु वह आत्मा अथवा अमृत को कैसे अस्वीकारेगा.
सौख्य क्या अपने हिंदू धर्म में नहीं है ? केवल उनमे आत्मा का वर्णन एवं स्वीकृति और परिभाषा है.
अक्षर ब्राह्मण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.
जो इन सोपानों पर चढ़कर अमृत पद पर अवस्थित हुआ वह इससे भला अनजान कैसे रहेगा ?
जन साधारण में आत्मा शब्द का उच्चरण इसलिए निषिद्ध हुआ कि वह अहम का पर्यायवाची बन चुका था. स्वर्ग प्राप्ति के निमित्त अश्वमेघ  यज्ञ, नरबली, पशुबलि, ब्राह्मणों को अबाध धन का दान होता था. ब्राह्मण कर्मकांडों के रटे-रटाए मन्त्रों, श्लोकों से पूजन यजन के परोक्ष में साधारण अंध रूढ़िग्रस्त जनता का सर्वस्व हरण कर रहे थे. यज्ञों से स्वर्गारोहण करा रहे थे.
प्रभु ने इसका आमूल खंडन किया.
ब्राह्मणों के वर्चस्व का हरण हुआ.
बीतराग ने स्वयं अपने बीते जन्मों का वर्णन किया.
यह बार-बार जन्म किसका होता रहा ?
यदि, आत्मा पर विश्वास ण होता.
तो शरीर में, पुद्गल के ताने-बाने में, कौन आबद्ध होता रहा ?

तृष्णा ! कदापि नहीं.
तृष्णा इस पंचभूत से उद्भूत इसी के संग नष्ट हो जाती है.
शेष रहती है केवल निष्कल निर्विकार आत्मा.
जो हर रूप में जड़-जंगम सबमे से संचरित और निष्क्रमित होती रहती है. 
इसे कौन नकारेगा.
प्रभु मूढ़ों के समुदाय में अमृत की घोषणा नहीं कर सकते थे.
उचित प्रस्तुत भूमि पर ही वपन होता है.
उर्वरा उर्वोही योग्य होती है.
अतः उन्होंने बराबर यही कहा निवीरनों को प्रहीन करो.
अमृत पद स्वयं प्राप्त हो जाएगा.
प्रभु ने भारतीय दर्शन के अपार ज्ञान-वारिधि से, निश्काक सारभूत विचारों को अंजलिबद्ध किया.
इन्होने स्वयं कहा कि बौद्ध धर्म एक शोध विधा है, यह कोई नवीन धर्म नहीं है. आडम्बरों से उन्मुक्त शुद्ध ज्ञान है. केवल अमृत रस है. सब वर्ग और समुदायों का इसमें उन्मुक्त आमंत्रण है.
यह मात्र प्राचीन भारतीय दर्शन का नवीनीकरण एवं परिमार्जन है.
शाश्वत सत्य किसी का मार्ग अवरुद्ध नहीं करता. इसी बात की पुष्टि अभि के दैनिक पत्र हिन्दुस्तान, रांची एक्सप्रेस के मंगलवार दिनांक १७.११.२ १९९२ में बौद्ध धर्म गुरु एवं मानव सद्विचारों के शिरोमणि परम पूज्य दलाई लामा जी के शब्दों में देखिये :-
“मैं यदि कहता हूँ कि बौद्ध और हिंदू एक ही हैं तो कुछ बौद्ध मेरी आलोचना करेंगे और यदि मैं यह कहूँ कि दोनों अलग-अलग हैं तो यह गलत होगा. किसी से प्रभावित होकर अपनी संस्कृति की उपेक्षा अवान्छ्नीय है.”
शुक्रवार दिनांक २०.११.१९९२ के रांची एक्सप्रेस में पुनः उन्होंने कहा कि-
“अहिंसा और करुणा एक सिक्के के दो पहलु हैं जो मानवीय जीवन के आधार हैं, भारत अहिंसा और दर्शन की जन्मभूमि है. यहाँ से दर्शन विश्व भर में फैला है.”
प्रभु के धार्मिक विचारों की भी यही आधारशिला थी.
समस्त धर्म एवं विचार जो जहां भी प्रसारित विस्तृत और व्यापक हो उनका मूल स्रोत वैदिक दर्शन ही है. भारतीय संस्कृति एवं दर्शन अनन्त, अक्षुण्ण, अजस्र और चिर व्यापक है. कहीं पर अहिंसा की मुखरता, कहीं निर्गुणता की प्रमुखता, कहीं सूर्योपासना, कहीं अग्नि पूजन. सब इसके रूप विपर्यय हैं. यह अनंत सौंदर्य अपनी सौष्ठव, शालीनता की अमृत तरंगिणी से समस्त विश्व को मनः मुग्ध करता आत्मिक शान्ति प्रदान करता रहा है और करता रहेगा. भूले हुए अपने घर की कुंजी यहीं पाते हैं. यह चिरंतन तृप्ति, अप्रतिम है.
बौद्ध धर्म अथवा अन्य जितने भी धर्म या विचार शृंखला हैं सब इसी की छाया में वैदिक संस्कृति के अमृत कलश से अभिसिंचित पल्लवित और विकसित हैं. धर्म के स्थूल नहीं, सूक्ष्म रूप पर यदि दृष्टि स्थिर रहे तो कभी भी कोई विवाद आमंत्रित नहीं हो सकता.
जो सत्य है उसकी पुकार सर्वत्र है.
इस काव्य का मुख्य उद्देश्य अद्यतन सामाजिक, राजनैतिक और  हर व्यक्ति के दैनिक दिनचर्या के नैतिक अवमूल्यन को दृष्टिगत रख कर किया गया है.
व्यक्ति मात्र विचारों का समूह है. जिसे हम आत्मा कहते हैं वह कोई संस्पर्षित वस्तु नहीं; एक आत्म उन्नयन की प्रक्रिया है.
इसीलिए बुद्ध ने कहा “अपना दीपक स्वयं बनो” या “एहि पस्सिहि “.
यह काव्य विश्व बंधुत्व और वसुदैव कुटुम्बकम की भावनाओं को प्रतिस्थापित करता है. स्वयं को पहचानने की मात्र चेष्टा है. आडम्बरों से दूर रहने का संकेत सता है.
यह अकिंचन विश्व प्रेम और विश्व शान्ति के निमित्त एक प्रयास मात्र है. अमृतेय बुद्ध के समापन के पश्चात एक अभाव सा खटकता रहा. बुद्ध अत्यंत उदात्त, सूक्ष्मतम कोमल भावनाओं के संवाहक थे. कोमलतम भावनाएं और जाज्वल्यमान स्वयंप्रभ ज्ञान क्यों परस्पर संवेदित, संतुलित, प्रच्छायित नहीं हो सके. एक नवीन विचारधारा का सांत्वनामय अवलंब चेतना को प्राप्त होता यदि यह उद्भावित, संभावित हो सकता.
ह्रदय और मस्तिष्क परस्पर पूरक हैं और साथ उद्भूत हुए. इन्ही विचारधाराओं के ज्वलंत चरित्र उत्तरा-आनंद हैं. दोनों दो विपरीत छोर हैं, किन्तु कहीं एक सूत्र से बंधे तो हैं. यह एक गवेषणा का विषय है.
अबतक इनका निराकरण या निदान क्यों नहीं हो सका. इसे असंभव कह वैचारिक क्यों हटते रहे.
नियति, विडम्बना, प्रारब्ध-वंचना. पराभव के पर्यायवाची हैं. अतः २७ सर्गों में निबद्ध इस काव्य में एक और सर्ग की वृद्धि हुई है. सत्यार्थी निर्द्वन्द्व, निर्भय, निष्काम, निरंतर आत्म्खोजी है. अतएव सद्साहित्य, चिर-नवलता, उत्फुल्ल मौलिकता से आप्लावित रहता है.
अतः अमृतेय बुद्ध प्रत्येक प्रबुद्ध मनीषियों की वस्तु है. 
आशा है वे इसे अपनी समझेंगे.

| सावित्री |
   


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