Saturday, 1 March 2014

सर्ग : ७ - प्रव्रजित


प्रव्रजित


विच्छिन्न अप्रकाशित
मानव चिंतन-सरि-धारा.
होता संवेदित हरित,
पल्लवित, पुष्पित,
वही किनारा,
जिसे तरंगायित लहरित
आलिंगित कर बढ़ जाती,
उज्जवल, भावाकुलित अनुभूतिमयी
कल्पना सप्तरंग तरंगमाला.
खिलते हैं.
भाव मुदित कुसुमित पात-पात,
प्रस्फुटित,
इन्दीवर श्वेत अरुण अम्बुज.
प्रतीक.
सात्विकता, अनुराग, राग,नैराश्य, विषण्णता.
कुमार मन.
बंदी.
शैवल जाल निबद्ध.
तर्क-वितर्क,
दुर्द्धष . उड़ा जा रहा कहीं दूर मन.
सौरभ, सरिस उन्मन.
आकर्षण विहीन, सब राग रंग.
एक ऊब.
जिससे निस्सार नहीं.
दृष्टि चाहती, विस्तार अन्यत्र कहीं.
सहसा आज्ञा दी दैवारिक को.
कहा- सारथि से सद्दः रथ लाने को.
आज उद्यानोत्सव में जाऊँगा.
विरस हो उठा हूँ इन प्राचीरों में,
उन्मुक्त पवन सा, स्वच्छंद विहार करूँगा.
आनंद मनाऊंगा.
समस्त रंग त्याग ह्रदय ने,
आज श्वेत वर्ण किया चयन.
श्वेत कर्णिकार, जाती पुष्प, मल्लिका यूथिका,
शिरीष, कुंद, शीतलक, श्वेत कमल सहस्र पत्र,
पुष्पाभरण, गंधराज, सेवंती, रजनीगन्धा अथक.
तन-मन पुलकित पारिजात-माल,
सुरभित,
वकुल, शिरीष. स्तवक गुच्छ,
सौरभ मद मदिरालस अंध गंध.
श्वेत पुष्प अनुस्यूत आमरण.
स्वर्ण खचित श्वेत परिधान,
केवल, श्वेत रंग के सकल विधान.
श्वेत, सात्विकता का प्रतीक,
शांति का प्रज्वलित शीतल प्रकाश-दीप,
आज मन.
कर रंग, तरंग-भंग, बन रहा,
एषणा ज्वलित क्षार अनंग.
रथ पर भी अवस्थित,
विष्ण्ण चित्त.
मन व्यथा अकथित अविदित.
राजपथ का समारोह,
वह भी पीडाजनक था.
यौवन. परिणामों के संग था.
जरा, पर मृत्यु वार घना था.
जन्म.
जन्म ही सब व्यथा कारण.
किस हेतु.
जीव करता शरीर धारण.
मन.
अभी विचार वात्याचक्र में,
शत-शत टुकड़ों में चूर्णित आंदोलित,
आलोड़ित घूम रहा था.
सहसा दृष्टि पड़ी.
वह.
मौन निज अंतर्लिप्त अध्यात्म
उदभासित दीप्त.
निर्द्वन्द्व विरक्त चला जा रहा था,
एकाग्र मौन अपने पथ.
मुंडित केश, उज्जवल परिवेश.
नहीं कहीं विषाद या चिंता का, किंचित लवलेश.
सोचा कुमार ने.
जग. झुका जा रहा वेदना भार.
हर चक्षु अनुस्यूत अश्रु हार.
निर्जीव मनः-हास म्लान मुखः-प्रकाश.
यह कौन. कैसा अवधूत.
विजयी यह निश्चिन्त.
समस्त एषणायें कामनाएं
अभाव दुराव चिंता
इससे हुई.पराभूत.
प्रश्न किया पुनः सारथि से
जग, जल रहा भव-अग्नि ज्वाल से.
यह.  है कौन.
क्यों जग से निस्पृह मौन. 
कहा सारथि ने- प्रभु.
यह संसार त्यक्त सन्यस्त विरागी.
समस्त आशाओं, अभिलाषाओं,
सौख्य, संपदा का त्यागी
निर्लोभी.
बीतराग विशोकी. परम विवेकी.
जग नहीं इसका, पर यह सबका.
इसकी शान्त निर्वात निवृत-मन-मंदाकिनी.
सबके निमित्त एक सामान बनी.
नहीं कोई उंच, नीच, संपन्न, विपन्न,
हर्म्य, प्रासाद, कुटीर सब पर एक समान,
शीतलता प्रदान करती,
प्रकाश बिखेरती उतरी,
इसके मन की जाह्नवी,
शाश्वत सहनशीला माध्वी.
प्रश्न किया गौतम ने-
क्या इसे.
व्याधि, जरा, मरण का भय नहीं.
या शीत ताप की बाधा,
इसे व्याप्ति नहीं कभी.
देव.
यह आंतर प्रकृति, बाह्य प्रकृति, जड़ प्रकृति,
त्रिविध ताप का ज्ञानी है.
यह. 
अहम ममत्व का दानी है.
इसे भलीभांति विदित है.
जग का चक्रमण करतीं ईतियों का.
समय की परिवर्तनशील
हर क्षण रूप बदलती, वृत्तियों का.
वह.
शरीर धर्म, प्रकृति कर्म.
जानता है.
यौवन, या शैशव, या जरा विकृतियों में है,
नर्तित अपरा.
मृत्यु.
अन्न कोषों का उत्क्षेपण है.
इसके पश्चात भी,
मनोमय शरीर. प्राणमय शरीर.
का भी,
ज्ञान जगत अध्यात्म प्रकाश में
अस्तित्व और अद्बोधन है.
फिर वह क्यों विषाद करेगा.
किसके हित वियोग करेगा.
जब.
प्राण चेतना अविच्छिन्न
चिरंतन निरंतर प्रवाह है.
पंचभूत केवल उसका विश्राम ठांव है.
वह. वियोगी नहीं,
चिर संयोगी है.
कुमार ने सब सुनकर ध्यान से,
मनोयोग से,
सहसा, वार्तालाप के मध्य ही किया निषेध.
न करो. अन्धकार में शल्य बेध,
जिसे. जानते नहीं.
पहचानते नही.
देखा नहीं. सुना नहीं.
सुनी सुनाई आधार-रहित बातों पर
मत आशाओं के महल बनाओ.
सौम्य !
विक्षुब्ध विषादयुक्त स्वर में
कहा कुमार ने-
शैशव सत्य.
यौवन सत्य.
जरा सत्य.
मृत्यु सत्य है.
सब बातें व्यर्थ उसके उपरान्त.
केवल 
शून्य.
घोर नैराश्य ध्वांत.
अनंत और संत में,
मनः विभ्रांत, अशांत,
नहीं अपेक्षित,
यह निरर्थक, अवांछित पुष्प वाग्जाल.
केवल.
जीवन-सरि शैवाल जटाओं के पग
निबद्ध.
लहराते किंजल्क जाल मे भुजाएं आबद्ध.
हो. स्वच्छ मुकुर.
निखरे, जिससे, स्पष्ट छवि सुघर.
किंचित कशा खींचता हंसा , सारथि.
प्रभु !
मंदिर में देवाराधन निरत देव दासियाँ.
नृत्यांगनायें .
क्या जान सकीं, परात्पर ?
प्रतिभा से, अन्य कुछ है ?
केवल अलंकार, भूषण.
शिंजिनी नाद ही,
उनका जीवन है.
उसी भांति मन भी.
जब तक एषणाओं से संकुलित
निबध्ह है.
वह, मनः-मंदिर के देवता
अहम ममत्व के सम्मुख.
समस्त कामनाओं के संग,
नर्तन करता है.
बस.
इतना ही भर उसका है
सीमित कार्य.
कब वह.
आत्म-चिंतन या मंथन करता है.
यह परिव्रजक.
इसने साधना की अथक.
अपरार्ध की कौंधती आत्म दीप्ती,
जो अधिमानस शीर्षस्थ पर है स्थित.
इसने उपलब्धि नहीं जाना.
सत्य संधान का उसे,
मात्र प्रवेश द्वार ही माना,
अतः दीप्तियों के निःश्रेणी से
उत्तरोतर यह आरोही हुआ.
संसार कामनाओं का शाश्वत,
निर्मोही हुआ.
प्रभु.
सांत. अनन्त की भाषा क्या जाने.
तर्क सम्मत विज्ञान ज्ञान को ही,
सत्य माने.
किन्तु सत्य.
सीमाओं के परे है प्रभु.
इन पार्थिव चक्षुओं से है दूर कहीं.
जो.
सारे कल्मष त्यागेगा.
उसमे ही सत्य ज्ञान जागेगा.
कहा कुमार ने – सौम्य !
सम्मुख ये शाखा प्रशाखा चौरस्ते
तुम देख रहे हो.
ये सब किसी के द्वारा निर्मित हैं.
सब, आँखें बंद कर, चल रहे.
क्योंकि
अति भीरु अतीत्व समीप है.
नव प्रकाश.
नव आवास.
नवीन विश्वास.
नहीं अपेक्षित इनको.
जब तक मैं.
तर्क-निकष पर नहीं कास लूँगा.
विश्राम नहीं रंचक मुझको.
चलो यहाँ से,
चलो शीघ्र.
मन. विषाद पूर्ण भरा-भरा.
मैं उद्यानोत्सव में जाऊँगा.
वहाँ के वादन, गायन और नर्तन में,
सोल्लासित उत्सव मनाऊँगा.
राग-विराग के मध्य, फंसा मन.
रहता है निष्क्रमण को उन्मन.
किन्तु विचित्र मन की भाषा है.
जिन श्रृंखलाओं से जकड़ा ऊबा.
उससे ही है गहरी ममता.
अटूट नाता है.
उन्हें तोड़ने में भी,
वह घबड़ाता है.
समझ न पाया मेरा मन,
यह भी.
ह्रदय चाहता, रहना भी,
स्वच्छंद कभी ?
या कैद में ही वह.
अपनी सुरक्षा समझता है.
व्यर्थ स्वतंत्रता निष्कृति की यह सदा,
मिथ्या योजना बनाता है.
विराग यदि शाश्वत है.
तो राग. अब तक जीवित क्यों है ?
हर मारक प्रहारों को सह कर भी
यह निश्चिन्त अचल यों है.

   

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