Tuesday, 15 January 2013

सर्ग २३ : नृत्यांगना चंदा


घोर निस्तब्धता छायी,
मगध राज्य सभा में ।
जब, सिंहासन पर अधीष्ठित,
राजा बिम्बसार का स्वर,
गूँज उठा क्रोधित ।
नृत्यांगना रूपसी चंदा,
प्रांगण के मध्य, मौन खड़ी थी ।
तुरंत, चंदा के प्रति,
मृत्यु दंड की घोषणा हुई थी ।
थी,
स्तब्ध जडवत नृत्यांगना ।
उमड़ती स्वासें, आंदोलित वक्ष ।
चकित विस्फारित आँखे अपलक ।
झूल उठे, लहराते मणिधर से विष प्यासे,
मदमाते लम्बे बिखरे कृष्ण केश ।
अस्त व्यस्त समस्त सुसज्जित, परिवेश ।
कांपती सी गिरी,
ग्रीवा की मौक्तिक बहुमूल्य सृका ।
टूटी केशों की पुष्पित अनुस्यूत वेणी ।
शांत पड़ी चरणों की शिंजिनी ।
नत आकर्णमूल, पद्मपलाक्ष,
निरीह कम्पित अश्रु बिंदु, रहे झाँक ।
मुख पर, ले रही थी करवटें,
पीड़ा की अनगनत रेखाएं,
अबोल बोल, अति मुखर मूक परिभाषाएं ।
सहसा, उसने शीश उठाया ।
स्पष्ट खुल नील नयनों में,
दो ज्वलित मशाल,
उद्दीप्त प्रखर प्रकशित प्रभासित लहराया ।
निरख उसे ।
राज प्रांगण आकम्पित थर्राया ।
आँखों के जल में, दो जलते दीप जले ।
या सागर-ज्वारों की लहरों से,
विद्युत् टकरा कर
शत-शत टुकड़ों में तड़प उठे ।
अश्रु, हो उठे पलकों में जडित,
ज्यों दो मोती चमक उठे ।
सहसा, भावावेगों की आंधी में,
पीड़ित रोष, लहराया ।
टीसों से आकुंचित,
आरक्त कसे अधरों पर,
बल पड़ आया ।
निर्भीक दृष्टि से उसने, घूम कर देखा,
सम्पूर्ण भरी सभा को ।
ली, गहरी सांस ।
सव्यंग मुस्काई, बोली –
सादर सहर्ष हार्दिक धन्यवाद, भरी सभा को ।
सटीक सार्थक उचित पुरस्कार,
मिला है, कला पारखी को ।
साधुवाद विद्वानगणों को ।
मुझे ।कंटक-किरीट मिला ।
निश्चय ही एकनिष्ठ तपः-साधना मेरी,
मुझको, मेरा अभीसिप्त अभीष्ट मिला ।
यदि अन्यथा हुआ होता ।
हुई कहीं एकनिष्ठ, अराधना में त्रुटी, या खामी ।
चोट मुझे दे जाती ।
कला को, सदा यही उपहार मिला है ।
उसका, अति दुर्गम बीहड़ संसार रहा है ।
काँटों में अश्रु पिरोना,
विद्युत्-टीसों में मुस्काना,
श्याम जलद दुकूलों में,
उद्वेलित ह्रदय छिपाना ।
प्रकृति से, यही पाथेय मिला है ।
कला,
पीड़ा की शुक्ति-कारा में कैद,
अनुभूति-अश्रु-प्रताड़ित,
स्वाति-कन है ।
हाहाकार मचाता अदम्य,
तरंगराज का, वाडव-ज्वाल प्रज्वलित,
अन्तर्निहित अजस्र रुदन है ।
महती कांक्षाओं का, मूक अश्रु-हवन है ।
यह मात्र, रस-मर्मज्ञों की,
अति मसृण मर्मान्तक कोमल धड़कन है ।
एकाकी उदय-अस्त होते नखत का
अवहेलित नियति प्रदत्त क्षरण है ।
प्रज्ञा और अनुभूति का,
परस्पर ह्रदय-निवेदित, संवेदित, गाढ़ालिंगन है ।
विलम्ब क्यों ?
मैं खड़ी यहाँ,
मेरे प्राणों की पुष्पांजली,
आज, कला के चरणों में,
सनत समर्पित होगी ।
उस विजयनी के चरणों में,
इन प्राणों की अनुरंजनी, शिंजिनी बंधी होगी ।
जाने कितने जन्मों की,
अनुत्तरित अनकही व्यथा
उन चरणों में लिपट, सिसकती,
अपनी रिसती पीड़ा का स्नेहिल उत्तर पाती होगी ।
कलाकार !
कभी के, सीमा-असीम, जन्म-मरण से,
पार, हो चुके रहते हैं ।
सत्य-गवेषणीय-चंचरीक ।
उड़ते दोनों पक्ष, जन्म-मरण होते हैं ।
उसका रस-मर्मज्ञ ह्रदय,
वह सत्य का मधु रस,
आप्लावित अमिय का,
तन्मय होकर, रसः-स्वादन करता है ।
संग संग चलते हैं जन्म-मरण ।
जिसे, जब भी, वह , चाहे,
तटस्थ निर्द्वंद्व, करे वरण ।
दोनों के रहस्य, स्पष्ट खुले पृष्ठ,
उसके सम्मुख होते हैं ।
अतः विलम्ब क्यों ?
मिटटी को, मिटटी में मिल जाने दो ।
अज्ञात काल का कैदी, प्राणों का पक्षी ।
उसे हर्षित मुदित पंख फैलाकर, उड़ जाने दो ।
था उद्दीप्त भाल,
तना, कम्बुकंठ लम्बी ग्रीवा । नील-नयन,
निर्मल निश्च्छल अतल, वारिधि में,
अभूतपूर्व वेदना की वृष्टि ।
सजल सघन श्यामल घन में,
कम्पित दामिनी झलमल ।
नील स्वर्ण खचित,
बहुमूल्य सूक्षाम्बर में,
आवेगपूर्ण, आवेशमयी उच्छवासित,
कमनीय कोमल कल लोचभरी, शातोदारी,
अरुणाभ अवदात जलजात सरिस, देह यष्टि ।
रसराज निवेदित मादक मंजरी ।
रही वह,
स्पष्ट बिम्बसार को अनिमेष, निरखती,
दोनों कर की बंधी अंजलि में,
मांग रही थी पुरस्कार,
प्राण-दंड ।
सहसा हुआ कोलाहल,
हटे, किनारे सत्वर सभी राजगण सभासद ।
निज चारिका की श्रंखला में,
किया,
प्रभु ने भिक्षुओं के संग,
अकस्मात्, राज-सभा में पदापर्ण ।
प्रथम दृष्टि मिली, चन्दा से ।
वह प्रांगण के मध्य खड़ी थी ।
ज्यों, बादल से विद्युत्, टूट गिरी थी ।
विधु से, चांदनी बिछुड़ कान्तिहीन हुई थी ।
या शापग्रस्त, भस्म-कंदर्प-दर्प निरख,
काष्टवत्, रति , जडित हुई थी ।
वह, थी । पीड़ा, करुणा, तिरस्कार, उपेक्षा की,
साकार ज्वलंत प्राणवंत, जीवंत मुखर, प्रतिमा ।
नृत्याभूषणों से सज्जित,
अश्रु-निमज्जित, नैसर्गिक कमनीयता,
लावण्यता की, सौष्ठवपूर्ण गरिमा ।
चरणों की शिंजिनी, धरा पर पड़ी थी ।
मेखला विश्रृंखलित क्षीण कटि में, अटकी, झूल रही थी ।
सम्मुख थे, प्रभु ।
काषाय वसन, चीवर, मृण भिक्षा पात्र, कर में लेकर,
परम ज्योतिर्मय उद्दीप्त उज्जवल प्रभा,
उत्फुल्ल स्वर्णप्रभ जलजात ।  
ज्यों, नील तडाग में,
सद्दः खिला । सात्विकता का शुचि प्रसाद ।
सर्वत्र व्याप्त हुआ ।
जो था जहाँ जिस रूप में,
अचल मंत्रमुग्ध था,
शास्ता को, अपलक निरख रहा ।
खो उठी चेतना,
कहाँ, रहा मन ।
कहाँ रहा तन ।
नहीं किसी को बोध रहा ।
सहसा, गंभीर गहन मृदुल कोमल स्वर,
गूँज उठा ।
बड़ी दूर से आ रहा हूँ ।
मार्ग से ही अति तृषित प्यासा हूँ ।
सहसा चौंके सब जन,
जिसके हाथों में जो, सहज उपलब्ध,
लेकर दौड़े सब तत्क्षण ।
स्वर्ण पात्र, स्वर्ण झारी, में लेकर जल,
खड़े हो गए, नर-नारी ।
मुझे ।
तृप्ति अपेक्षित है,
तृप्त भी होऊंगा ।
किन्तु नहीं जल वांक्षित तुम सब से ।
वह ।
किशोरी,
जो अब तक मौन विषण्ण खड़ी ।
जल लूँगा मैं उससे ।
चौंकी चंदा ।
आमूल कंपी लतिका में,
रात्रि प्रहर का, संचित,
सब जल बिंदु सहसा, एक साथ,
अचानक अबाध झरा ।
अश्रु आप्लावित, भींगा मुख,
ज्यों जलनिधि में डूबा विधु ।
शीश झुका ।
दोनों कर जुटा ।
नमित व्यथित अति भींगे भरे गले से, बोली-
प्रभु !
जल में जितने भी, डूबे गागर ।
कभी न भर सके पूरा सागर । 
हाहाकार मचाता, गगन घर्षित तरंगित रत्नाकर,
कभी अपनी बाहों में क्या,
भर पाया, निशिकर ।
प्रभु !
सौन्दर्य व्यर्थ ! गुणवत्ता व्यर्थ !
एक ही परम सत्य ।
मैं ! अस्पृश्या बाला !
छलकते अमिय में, गिरी, विषाक्त-सीकर की ज्वाला ।
मैं ! पतित अंत्यजा ।
केवल, ये झरते अबाध अश्रु ।
कर सकते हैं ।
तव पुनीत पवित्र पद-प्रक्षालन ।
प्रभु !
ये लम्बे काले कौशेय केश बिछा दूं ।
उन्हें ।
तव चरणों के कोमल पावडे बना दूं ।
जितने शूल चुभे चरणों में,
जितने रजकण भरे पदः त्राणों में,
उनको, इन पलकों से सहज उठा लूं ।
इतना ही है, अधिकार मुझे ।
रही सदा की रीती गागर ।
इतना जल बरस गया,
अम्बर, इतना आबाध रहा,
जलनिधि-लहर, उछल-उछल ।
नहीं कोई, कूल किनारा ।
मौन रहे सब, निज अंतर जल भर-भर ।
नहीं, अभी तक,
कभी किसी ने,
मुझे पुकारा,
हर तट पत्थर ।
हर निर्झर निर्मम ।
वह पावन जल क्यों कर पाऊँ ।
कैसे यह तृषा बुझाऊँ ।
मैं कैसे गंगा बन जाऊं ।
कैसे अंशुजा की गहनता भाव प्रवणता पाऊँ ।
तव पावन पुनीत पद कंज तले,
प्रज्ञा-ज्योति जलाऊँ ।
मैं कैसे वाणी बन,
सरस्वती का अनुरागी जल पाऊँ ।
झर रहे उन्मुक्त शुद्ध जल प्रपात ।
बह रही अबाध कुल्याएँ सरिताएं ।
अवश मैं फिर भी,
वह जल कहाँ से पाऊँ ।
सदियों से, पट बंद मिले उनके ।
क्यों कर मैं घट भर पाऊँ ।
प्रभु ! मैं, शुद्र, पद दलिता नारी ।
युग-युग से, उच्च वर्ण द्विजों से हारी ।
यह, प्रभु-आकांक्षा ।
और मेरी मुर्मुष तितिक्षा ।
सदियों का वर्जित अधिकार,
कहां से, क्षण भर में पाऊँ ।
तव पावन श्री चरणों की सेवा से,
क्यों कर हो, यह हत् भाग्य जीवन सफल ।
इस संत्रसित व्यथित, जीवन-मरण से,
किस प्रकार विमुक्ति आऊँ ।
मैं अभागिन ।
वह भाग्य कहाँ से लाऊँ ।
जो,
इस आप्लावित स्नेह-सुधा-सागर में,
निज,रीती अंजलि भर पाऊँ ।
पद-रज पराग सी,
मैं तव पथ पर बिछ जाऊं ।
जहां अवस्थित हैं, प्रभु ।
उस परम उच्च आसन तक,
कैसे, ये कपते डग भर पाऊँ ।
प्रभु ! धूलि, धूलि होती है ।
वह कब चन्दन की गरिमा से भरती है ।
हर कोई, उसे कुचल कर जाता है ।
पतझारों का तीखा काँटा भी,
उसमें बिछ जाता है ।
हर बार तिरस्कृत, पद-भर दलित, पीड़ित,
धरती का अन्तर-दह तक, भर-भर जाता है ।
फिर भी , वह । उपेक्षिता ।
घोर तमिस्रा आँखों में भर कर,
काली रातों में स्वप्न कँवल संजोती है ।
उलटी सीधी तेज हवा ।
वर्षा आतप शीत से,
शरीर, तपित और कम्पित, जला,
ठिठुरा, रह जाता है ।
वह ।
मौन ।
सिसक सिसक, रह जाती है ।
यह धरती ।
संहार-सृजन, हुए कितनी बार ।
वह । कुचली गयी अगणित बार ।
जाने कितनी बार जली, अरमानों की होली ।
उड़ी राख बन ।
मिली पवन में,
जली अग्नि-कन, बन दग्ध गगन में ।
जब भी जल में बहकर, गिरी, जलनिधि में ।
रही गलती, लवण-पाषाण बन कर,
उसके अतल अंतर में,
उसे भी लहरों ने ठुकराया ।
नहीं, धरा, नहीं पवन, नहीं गगन ।
क्या कभी कहीं किसी ने,
उसे, साग्रह अपनाया ।
बनकर, मिट कर भी, बन न सकी, कदापि वह ।
उन्नत ललाट की रोली ।
वही उपेक्षित व्यथित तिरस्कृत, चरण-रज हूँ,
मैं ।
हर वर्गों की ठोकर मुझे मिली ।
हर ऋतुओं की तीखी तेवर से,
सदा सतत बिंधी ।
फिर भी अचल अडिग अवस्थित,
वहीँ रही,
जहां, उंच नीच सबकी,
चिता, एक संग जली ।
जाने किन जन्मों का संचित पुण्य ।
मेरे अंचल में, उज्जवल वरदानों सा,
गिरता, गिरता,
आते जाते ज्वलित अभिशापों के जलते,
अंगारों से, भर उठा ।
मैं ।नितांत दीन-हीन अंत्यजा ।
क्यों,
कला नैपुण्य का पादप रसाल,
इस, नीरस सैकत-वन में उपजा ।
क्यों हो उठी दोलित,
रसः-आप्लावन में आकंठ स्नात ।
प्राप्त, वह दंड । अप्रत्याशित अज्ञात ।
प्रभु ।
स्वाति जल बूँद भी,
स्थान-विशेष से ही, समादृत होती है ।
अर्हि के विस्फारित मुख में पड़,
मर्मान्तक विष हो जाती है ।
मैं, बनी न गजमुक्ता,
बनी न कदली-कपूर ।
बनी गरल, विष-ज्वाल-प्रमत्त-भरपूर ।
यह । कला ।
अमिय कहीं होगी ।
पता क्या था । मेरे निमित्त ।
यह ।
प्राणान्तक शर्तों में बंधी मिलेगी ।
किसी कला से बंधना,
आजन्म स्वांस-स्वांस में, उसके हांथों है बिकना ।
तन-मन-जीवन, दग्ध विकल ।
अंतरदह तक पहुँच चुकी अगन ।
यह आग ।
भला क्यों कर बुझ पाए ।
बीते जितने भी जन्म-मरण ।
यह वर्तमान और आगत,
सब करबद्ध प्रणत,
इसमें आये, शीश झुकाए ।
समझे कौन ।
यह व्यथा निरंतर असह्य मौन ।
बिंधा जिसे यह तीक्ष्ण पृषत्क ।
कह न पाया वह ।
इसकी पीड़ा कितनी गहन ।
मर्मान्तक अथक ।
पल एक थमे न, रिसती टीस ।
अनगनत सुईओं की अनवरत चुभन कसक ।
मंत्रमुग्ध विभोर मनः-कानन ।
गंध-अंध-आकुल गया महक-महक ।
यह प्रगाढ़ तन्मयता ।
अग जग की सुधि ध्यान
भला क्या कभी रहा ।
यह सांसारिकता मुझसे ।
मैं लोकाचारों से सतत रही अनजान ।
मैं ।
कला की सोपानों में चढ़ ।
गयी कहीं, अधिक आगे बढ़ । 
अब शिंजिनी नहीं,
यह स्वर, अक्षर ।
मुझे कहीं अधिक पागल करता है ।
जो । अनगूंज गूँज गुंजित मन में,
वे ।
बांध न सके किसी बंधन में ।
शिंजिनी, कर्णिका, तूलिका,
मात्र, एक कमनीय कलात्मक माध्यम है ये ।
उस परम सत्य संधान में ।
प्रभु ।
आप दयामय करुणामय ।
कोटि-कोटि, सात्विकता का पारावार,
तव चरणों में नत विस्मय ।
यह प्रखर प्रज्वलित विशाल व्यापक प्रकाश,
अनंत अविराम विकीर्णित ।
हो ।
कोई कुटीर । कोई हर्म्य ।
सब, एक सामान प्रकाशित ।
प्रकाश भेद नहीं जानता ।
किन्तु,
महलों की अपार समृद्धि, अहंकार ।
झोपड़ियों का घुटता मर्मान्तक अन्धकार ।
दोनों को, स्पष्ट उकेर कर रख देता है ।
उनकी स्थिति, सटीक संतुलित,
पक्षपात-रहित, प्रकट कर देता है ।
अतः
प्रभु ।
प्रकाश हो या अन्धकार ।
आनंद हो या हो व्यथा-भार ।
दोनों ही नियति घर्षित मर्दित चरण ठोकरों पर ।
ठोकरों से, निस्सहाय निरुपाय को,
उसकी असमर्थता विवशता को,
और अधिक गहन चोट दे जाते हैं ।
प्रभु ।
तव तृषा शमन करूँ,
खड़े जितने भी गणमान्य,
सबको घनी उपेक्षा से भरूं ।
और स्वयं को,
अत्यंत महत्वपूर्ण जान,
अंतर में,
अवर्ण्य असह्य अबाध, अहम जगाकर,
कातर, कम्पित, जीवन डोर को,
कान्तर कंटक-वन में, और जटिल उलझा लूं ।
नहीं ।
बीतराग ।
उदीप्त प्रसाद ।
नहीं ।
जैसी हूँ । वैसी ही रहने दें ।
मत जल देने को,
इस आकिंचन को बाध्य करें ।
क्षण अंक बंद दोनों
करबद्ध प्रणत बोली वह मन ही मन-
मैं ! वीणापाणि के चरणों में बंधी, शिव-शिंजिनी में ।
तू ! अनंत शून्य के अरण्यों में ।
एक गवेषणा ।
एक साधना ।
माध्यम भले ही हो, अन्य-अन्य ।
सबकुछ प्रभु मनः-मुकुर में,
निर्मल स्वच्छ उभर आया ।
बोले सस्मित-
दीपक जो, जहां भी जलता है ।
वह, सत्य-साक्ष्य-प्रतीक होता है ।
किन्तु ।
कोई भी कला ।
मात्र ।
आत्म अभिव्यक्ति है ।
यह, अपार, अबाध, अतृप्ति अतृप्ति ही है ।
केवल, तन-मन का सौन्दर्य प्रसाधन ।
ममत्वपूर्ण, अंध अहम का, ज्ञापन है ।
आत्मकेंद्रित तन्मयता का चरम,
स्वतः अभिव्यंजना का माध्यम,
साहन है ।
इसमें,
उजर्स्वित निवृत्ति कहां है ?
कोई भी, ज्ञानोंन्मेष
कभी शब्द, सीमा, रूप, आकार, प्रकार में,
लिपि-कलेवर सीमा में,
कदापि नहीं होता आबद्ध ।
ज्ञान-ज्योति प्रखर भास्वर,
उत्ताल तरंगित अप्रतिहत वारिधि,
अपार अनन्त स्वच्छंद ।
मन्त्रदृष्टाओं ने किया,
केवल, ज्ञानानुभूतिओं का अवगाहन ।
परा, पश्यंती वाक्,
मात्र, योगियों के हैं संवाद ।
इतर प्राणी अनिभिज्ञ इनसे,
वे हैं इसके अपवाद ।
ज्ञान-यज्ञ में समस्त वृत्तियाँ होती है भस्म ।
सत्य-प्रकाश निर्वात निष्कंप अचल ।
समय-चक्र में,
नित्य अनित्य कभी नहीं रहे, एक सरिस ।
दोनों का ही होता क्षरण ।
प्रकृति में पल प्रतिपल अनवरत,
परिवर्तन ही परिवर्तन ।
अतः किसी भी, मानवीय संवेदना को,
न कर प्रव्रज्या से तुलना ।
आत्मअभिव्यंजना ।
साधन नहीं ।
अनगनत जल वीचियों के दर्पण में,
मात्र, स्वयं को है निरखना ।
यह मृग तृष्णा है । छलना है ।
आत्म वंचना है ।
सत्य से कहीं दूर, केवल,
लालसाओं की जलती लपटों में,
मुग्ध शलभ सा,
बलात् पतित होकर जलना है ।
स्पृहा । ऐश्नाएं ।
भला कभी साधना क्यों कर, होगी ।
आत्म स्वीकृति का अनुमोदन ।
कदापि नहीं करता,
जटिल इच्छाओं का भंजन ।
आत्म-तपः !
निर्विकार निष्काम एकनिष्ठ एकाग्र,
सत्य-शोध विधा है ।
अतः यहाँ, क्षुद्र, अहम को स्थान कहाँ है ?
दे । शीघ्र जल दे ।
अब मत कर अधिक विलम्ब ।
चारिका में निकला हूँ ।
राह में, जाने कितने कैसे आर्त विकल मिलेंगे ।
वे क्या-क्या, अपनी व्यथा कहेंगे ।
अब भी,
आंधी से कम्पित लता सी, खड़ी रही,
जडित, नमित चंदा,
दोनों कर में स्वर्ण-जलपात्र लिए ।
कांपते अधर,
आँखों में जल ।
मुख पर पीड़ा की रेखाएं, आकुंचित मुखर ।
कभी देखती राजगणों को,
जन संकुलित भरी सभा को,
कभी स्वयं को,
स्वप्न-विमुग्ध-विसुध, समझ न पायी वह ।
कि अब भी वह है जड़ित,
या बढ़ रहे उसके पग,
प्रभु के समीप, जल देने को,
मन्त्र विमुग्ध यंत्र चालित ।
झरित जल, गिर रहे कहाँ ।
उसे कुछ ज्ञात नहीं ।
जल पान कर,
अभय दान कर,
किया प्रभु ने सत्वर प्रस्थान ।
दोनों कर में जल पात्र पकड़ कर,
चंदा खड़ी रही, राजाज्ञा को ।
कहा सलज्ज बिम्बसार ने-
हम सबकी कर उपेक्षा,
किया जिन्होंने तुझे समादृत ।
अब हो ही क्या सकती है,
कोई भी आज्ञा, उसके निमित्त ।
तू चाहे जहां जा सकती है ।
मुझे नहीं है कोई आपत्ति ।
अबतक धनञ्जय श्रेष्ठी कुमार,
मौन खडा निरख रहा था सभागार ।
देखा उसने, चंदा को,
सहज चमत्कृत होकर ।
चंदा ।
सागर की रोषभरी आंधी सी,
पावस की अबाध अप्रतिहत, वेगवती सरिता सी,
तत्क्षण सत्वर क्षिप्रगति से,
राज सभा से बाहर आई ।
उसके पीछे लम्बे डग भरता,
अस्फुट स्वर में साग्रह अनुनय करता,
श्रेष्ठीपुत्र धनञ्जय भी आया ।
इस समारोह के,
हम दोनों ही घोषित श्रेष्ठ नर्तक ।
क्यों न यहाँ के नियमों से आबद्ध हो जाएँ ।
क्यों रहें अब हम पृथक-पृथक ।
जो प्रथा चली आ रही मगध की,
क्यों न सहर्ष अपनाएँ,
हम दोनों ही परिणय में बंध जाएँ ।
घूम कर देखा,
चंदा के,
उद्दीप्त हो उठे रोष से, अश्रु भरे लोचन ।
घुमड़े नयन क्षितिज पर, कजरारे नीर भरे बादल,
और तड्पी बिजली, तत्क्षण ।
हतप्रभ हुआ श्रेष्ठीपुत्र,
देख, बादल बिजली की तड़प द्रुत एक संग ।
उमड़े, तीव्र आक्रोश के,
पलक कोरों पर सप्त रंग ।
नख से शिख तक,
हो उठी, निज असह्य विष से कम्पित ।
दोलित अंग-अंग ।
अधरों पर, एक पीड़ित विषैली आकुंचित, मुस्कान ।
आने वाले विप्लव का आह्वान ।
बोली सव्यंग अति तिक्त स्वर में-
श्रेष्ठी पुत्र !
जब, मरण-दंड मिला था मुझे ।
अंत्यजा होने का,
अभिशाप उदित हुआ था तत्क्षण में,
संग-संग आकर एक साथ रुके,
तव कदम, एक पल भी थमे नहीं ।
सत्वर पीछे हटे थे, क्षिप्र गति से, सहसा, सहम ।
कहाँ था तुम्हारा आत्मबल ।
क्यों नहीं सबके सम्मुख मेरा हाथ पकड़ कहा तुमने ।
अब न करो ये अश्रु निसृत अविरल ।
कला ! वरदान है ।
अंधी, मूक, वधिर, हठी है ।
नहीं देखती, नहीं बोलती, नहीं सुनती,
और , कभी न, अपने पथ से हटती है ।
यह अमृत !
उंच नीच नहीं देखता ।
भाव-वैषम्य, नहीं जानता ।
सब पर एक सरिस बरसता है,
जिसे यह, मनोनयन करता है ।
कलधौत कौमुदी की अजस्र बरसात,
खिले जिसमे, मानस-सरि के बंद, कंज अवदात-स्नात ।
इसे ।
वही पाते है ।
जो एकनिष्ठ एकाग्र तपस्वी होते हैं ।
यह, अर्जुन का मतस्य-वेधन है ।
अटल ध्रुव नक्षत्र है ।
चिर अतृप्त पिपासित पपीहे का स्वाती कन है ।
पाते वही ।
जिन्होंने ज्ञान-यज्ञ यजन किया है ।
पीड़ा की वीणा में, इसके सस्वर मुखरित ।
कोई भी कला ।
अनायास नहीं मिलती है ।
जन्म-जन्म के, तपः-निकष पर,
यह, हिरण्यमयी खरी उतरती है ।
पाणि-ग्रहण तो दूर ।
मुझे, तेरा साथ भी असह्य ।
तूने क्या जाना ।
मैं ।
राजाज्ञा शिरोधार्य करती ।
कदापि नहीं ।
सागर से उद्भूत हुए अमृत और हलाहल ।
एक तत्व का, यह, रूप-विपर्यय ।
एक प्राणवंत, दूसरा मारक ।
तुम !
अब भी, तुम में है निहित,
घृणित छल का जघन्य पतित बल ।
जो, अभी अचानक, प्राप्त हुआ,
इस जीर्ण शीर्ण जर्जर आँचल में,
गौरान्वित संपदा का अलभ्य धन ।
उसे ।
इस मधु आवेष्ठित भाषा से,
करने आये हो अपहरण ।
सदा से, श्रेष्ठ वस्तुओं के,
अभिजात्य वर्ग हैं, जन्म-सिद्ध अधिकारी ।
और उपेक्षित उच्छिष्ट तिरस्कृत अवांछित, के,
हमसब, नत प्रणत करवद्ध दीन भिखारी ।
बोला अनुनय भरे स्वर में धनञ्जय-
अभी कहा नहीं तूने ।
कला, कोई वैषम्य नहीं जानती ।
बोली चन्दा- कहा था ।
जो विवृत कपाट निषकल्मष है ।
निर्भीक, अभय, द्वंद्वरहित,
सदा सदाशय है ।
उदात्त, सरल, निश्च्छल, अटल,
जिनके विचार स्वच्छ और प्रांजल हैं ।
तेरे निमित्त नहीं,
जिनमे भाव वैषम्य वृत्ति-जाल है ।
जो । उच्च वंश मर्यादा-दर्प के
विष बुझे सर्प से दंशित हैं ।
मुझे,
तेरा समाज । नहीं पचा पायेगा ।
यह अति गरिष्ट भोजन,
अरिष्ट ही लाएगा ।
मुझसे बंध, समाज में बंधना,
क्या कभी संभव हो पायेगा ।
मैं । शूद्रों में, वह शुद्र हूँ ।
यदि उच्चवर्ग की गलियों से  निकलूँ,
मार्ग, कपाट, द्वार, धोये जाते हैं ।
यदि प्रातः कोई मुझे देख ले,
ब्राह्मण को,
ग्रह शान्ति हेतु,
अशुभ-निवारण के निमित्त, दान दिए जाते हैं ।
मेरी छाया ।
अभिजात कुल कीर्ति-कौमुदी के पूर्ण चन्द्र को,
राहू सा ग्रस जाती है ।
मैं ।
वह अंत्यजा हूँ ।
शुद्र ।
नीच वर्ण हूँ ।
वर्जित है जिन्हें वैदिक अध्वर ।
वेद-वाक्य, श्रवण कर लेने का, दंड,
कर्ण में उष्ण तेल मिला था ।
शरीर ।
मेरा हो या तेरा ।
भोज्य है, वह, जलती चिता का ।
मत निरख ।
रजत स्नात झूमता नव मल्लिका सा,
यह कमनीय कान्त गात ।
ये कदापि नहीं,
सद्दः विकसित तुहिन खचित अरुणाभ, जलजात ।
भले ही बिखर गया इनपर,
लावण्य-ज्वार का मत्त प्रभात ।
किन्तु, जन्म-जन्म से, सदियों से निरंतर,
इनकी जीवन स्वासें, कर रही पान,
चिता की कज्जल-कृष्ण-कल्मष-कडुवे-धूम ।
ये ।
आँखें ।
स्वप्नों को भर, नहीं, कजरारी काली हैं ।
इनमें, अंत्येष्ठि अग्नि की,
उठती लपटों के असह्य तपन की लाली है ।
चिता के निमित्त रखी,
या उनपर ही जली, समिधायों से अथवा,
जल चुकी चिता के शेष ज्वलित अंगारों पर,
बनता है, हम, त्रिशंकुओं का भोजन ।
यह, तन ।
उसी चिता,
उसी राख,
उसी पानी मिट्टी और अन्न से,
सदियों से उन्हें पचाता आया,
और हुआ निर्मित है ।
उन अंत्येष्ठि-यज्ञ से ही,
रोम-रोम अभिसिंचित है ।
इसमें, तुम ।
अभिजात्य कुलो के केशर कुमकुम चन्दन की, नहीं सुगंध ।
बसी हुई है इस काया में, जले, शवों की चिरायन्ध ।
यह तन, सदा चांडाल-महाभोज को, लालायित ।
इसमें, असमय, अप्रत्याशित, मृत्यु-प्राप्त,
अतृप्त आत्माओं के, आहात-अरमानों का रक्त प्रवाहित ।
यह अंत्यज ।
जीवित और मृतक के मध्य का माध्यम है ।
इसे, आत्मसात कर पाना, अति दुष्कर, दुर्वह, दुर्गम है ।
मानव ।
मानव होते हैं एक,
किन्तु किस प्रकार शोषित मर्दित दलित कर,
निम्न स्तर पर, अवस्थित कर भी,
तुमलोग ।
संतुष्ट नहीं हुए ।
हम सशरीर जीवितों को ।
प्रेतों की नगरी भेज दिया ।
कला ।
निर्बंध सिन्धु है ।
इसकी कहीं परिधि नहीं ।
प्रतिभा ।
प्रज्ञा का नव ज्ञानोन्मेष है,
इसमें पीड़ा अशेष है ।
जो इस शर से हुआ बिद्ध ।
कहीं नहीं उसकी औषधि ।
कहा धनञ्जय ने हौले से-
मत कर रोष । मत दे दोष ।
तुझे लेकर मैं अन्यत्र कहीं बस जाऊँगा ।
इस समाज को त्याग, दूर कहीं चला जाऊँगा ।
चौंकी चंदा- इतना बड़ा त्याग !
बना, कबसे सदियों का पाषाण ह्रदय, उदार ।
कभी तो तुम ।
मेरे संग,
सामाजिक समारोहों में, करोगे विचरण ।
नत पलकों में, तिरस्कार भरी, वक्र भंगिमा,
व्यंग भरी मूक बनी, अत्यंत विषैली मुस्कान,
आँखों आँखों में, अवहेलना उपेक्षामय तीक्ष्ण संभाषण का,
मौन आदान प्रादान,
दप-दप, करता उच्च वर्ग का, असह्य अभिमान ।
क्या कर पावोगे, निःशब्द सहन ।
हो सकता है, चिरंतन की चली आ रही निर्ममता ने,
सिखलाया हो, सब, सह लेने की क्षमता ।
किन्तु ।
मैं नहीं ।
मुझमें नहीं यह सब सह लेने की, अवश सहिष्णुता ।
मैं ।
नहीं चाहती यह संसार ।
नहीं अपेक्षित इसका आभार ।
मुझे ठीक पता है ।
इन उच्च वर्ग की स्नेहिल शीतल दिखती आँखों में,
कितनी जलती घोर, वितृष्णा है ।
असह्य उपेक्षा है ।
मेरी एक निसृत निसंग, तपः-कुटिर,
अजस्र झरित, मौन नयन नीर ।
निर्वात निष्कंप अंतर वर्हि, मौन ज्वलित एकाकी दीप,
भरकर अंतर में, शत शत पीर ।
मेरे भी पूजन गृह में देवी देवतायें हैं सुशोभित ।
वे भी अगरु धूम से पूजित, चन्दन केशर से चर्चित ।
इन करों के जल से होता है उनका अभिषेक ।
पूजन-आराधन में, वे भी निरखते हैं अनिमेष ।
और मन के आदान प्रदान संलापन,
परस्पर, चलते हैं निर्बंध अशेष ।
दीन कुटिर में होता है ।
अर्चावतार ।
जीवंत मुखर होता है,
पूजन का पुनीत भावप्रवण संसार ।
साकार । निराकार । एकाकार ।
संवेदन का सम्मोहक संभार ।
किन्तु, वे ही देव प्रतिमायें ।
जब तव मंदिर-प्रकोष्ट में प्रविष्ट होती हैं ।
कितनी, दूर पराई, अपरिचित हो जाती हैं ।
उनपर, धर्म, समाज के
एकाधिकार की मुहर पड़ जाती है ।
वे ।
नाना प्रकार के आडम्बर व्यवधानों,
उंच नीच की जातिगत परम्पराओं से,
जटिल, घिर जाती हैं ।
घंटे घड़ियाल के मतुमुल नाद में
देवता का स्वर विलुप्त हो जाता है ।
ब्राह्मण का स्वर बुलंद, मुखर हो जाता है ।
देवता के चरण, स्वर्ण श्रृंखलाओं में बंध जाते हैं ।
बोल अबोल अधरों के भीतर घुटकर, रह जाते हैं ।
मेरे प्राणों की डोरी बंधी जहां ।
नूपुर स्वर सस्वर हुए वहां ।
वह ।
परम सत्य ।
जीवन-तथ्य ।
ज्योतिर्मय प्रभापुंज निकर, खिले अवदात,
विश्व कमल के सहस्र उन्मन, उन्मन पात ।
पात-पात पर, कम्पित कर्णिका पर,
उसका नृत्य ।
झर रहे, खगोल-भूगोल, ब्रह्माण्ड, भुवन, उडुगन,
बन, अनगनत सीकर-कण ।
घर्षित चरण,
मर्दित क्षुभित महाश्मशान,
उड़ रहा क्षार,
विलुप्त, सभी संज्ञा, लक्षण, अभिज्ञान ।
जो राख उड़ी वहां,
इन चरणों को लगी यहाँ ।
आग लगी सर्वत्र भुवन में,
ले रही सांस प्रकृति,
जलती लपटों की छाया में ।
यह ।विश्व ही, एक जलती हुई चिता है ।
रवि, शशि,नखत, तारक गण, इसकी समिधाएँ हैं ।
समय के विशाल कढ़ाह में,
महाकाल का, पच रहा, अनवरत ओदन ।
चर-अचर,सबका,
कर रहा, अविराम भक्षण ।
जो भी यहाँ खड़े,
मात्र अवधि रशना में हैं बंधे ।
वह,
परम सत्य ।
हिरण्यगर्भ परा-अपरा मर्म ।
साक्षात ब्रह्म ।
संहार, सृजन, लास, तांडव,
सबका हरता-करता ।
उसके शाश्वत एकतारे पर,
केवल, एकाक्षर ॐ है बजता । वह,
नर्तक है, सर्जक है ।
सर्वनियन्ता अखंड अगोचर है ।
वह कला चरम अभेद्य रहस्य मर्म,
सर्वश्रेष्ठ जेष्ठ,
अजन्मा,
फिर भी श्रृष्टि अग्रज है ।
कर्म, एक ही हम दोनों का ।
वह,
जीवित शव को समय-समिधा में, कर रहा भस्म ।
बनते सब, जल, वायु, आकाश, अग्नि, अश्म ।
वह । अग्नि दे रहा समय को ।
मैं अग्नि दे रही चिता को ।
दोनों ही एक वर्ण एक जाति ।
भले ही वह सर्वनियन्ता ।
और मैं तिरस्कृता अंत्यजा ।
यह बलात बाधित अभिशाप
इस निकृष्ट समाज ने ही सृजित किया ।
वह सर्वनियन्ता ।
केवल दृष्ट ।
उसने केवल एक अच्छ्वास,
विश्व चेतना में था, फेंका ।
किन्तु वह तटस्थ ।
जिसके कार्य इतने स्पष्ट ।
वह ।
काल महाकाल, अकाल, विकराल ।
निज चिरंतनता का,
उसके रूप विपर्यय क्षणभंगुरता का,
देख रहा, अविराम,
विश्व-दर्पण में नर्तन, विशीरण और सृजन ।
समय पियूष-सीकर का,
कर रहा, अविछिन्न गति से पान ।
यही ।
काल अह्वान ।
हो ।
महाश्मशान ।
अथवा प्रकृति चित्र विचित्र चूनर परिधान,
उसके निमित्त दोनों ही एक समान ।
उसने कभी, जाति वैषम्य नहीं रचा ।
प्राप्त मुझे समाज की स्वार्थपरक घृणित सजा ।
इस समाज से प्राप्त,
सदा से निर्मम पक्षपातपूर्ण प्रतिभिस्कंदन ।
ज्वलित प्रश्नों से हम सबका कर मुख बंद,
पड़ी अनवरत प्रतिष्कशा स्वच्छंद ।
प्रक्षुणित क्षुभित मर्दित दलित हम सब,
पड़े कराहते बेसहारे धरा पर,
निठुर प्रतोद प्रहारों से ।
ये उच्च वर्ग के मधु आवेष्ठित गरल विष,
सुसंकृत बोल,
घोल रहे कण-कण में जीव के असह्य तपन ।
तुम्हारे अहम भरे विनम्र दीखते
प्रत्येक कार्य कलाप,
केवल निज मन के ही प्रिय अलाप ।
मुझे घोर घृणा है तुम सबसे ।
तुमलोगों का विषैला दर्प,
ज्यों छू गया शरीर को अकस्मात्,
गिजगिजा गन्दा गीला सर्प,
यह अंतर-दह उत्पीड़क असह्य जुगुप्सा ।
तुम अब भी अपने ही मद में ।
पता नहीं तुमको,
कितना पानी चला गया सर के ऊपर से,
धुले न घाव, मिली न छाँव,
अन्य के निमित्त उसी स्थान पर 
पुरस्कार, उपहार, सादर सत्कार ।
भर-भर लाया समय का
अनवरत चलता हुआ स्पंदन ।
किन्तु निम्न वर्ग को वही प्राप्त
तिरस्कृत भोजन । निर्मम कठोर वचन ।
असह्य जीवन अभाव ।
उपेक्षा का कंटकित तप्त सैकत वन ।
रहा सदा शोषण का अटूट अभंग यह क्रम ।
सदैव रही समाज के हाथों में,
नाप-तोल की तुला ।
झुकी उधर ही,
जिधर उसे, आशातीत मनः-वांक्षित लाभ मिला ।
किन्तु, कलाकार ।
वणिक नही ।
गणित भी उसे ग्राह्य नहीं ।
छोटी छोटी गणणाओं में अटकता है ।
गिरता है, वह, बड़े जोड़ तोड़ में
भला कहाँ संभलता
और, उलझता है ।
सम्मुख आप्लावित लहराता जीवन मधु,
वह, भर भर अंजलि, उन्मुक्त दान करता है ।
उसका, वेदना का अपार वारापार ।
नैराश्य सजल घन, नयन क्षितिज पर करते मनुहार ।
अश्रु वारि वर्तिका,
अनवरत जल-जलकर,
सघन तिमिराच्छन्न नयन द्वार को
करती रहती आलोकित ।
घन कज्जल अन्धकार में,
कौंधती रहती, तीसों की तड़ित ।
अवकाश कहाँ उसको ।
वह देखे ।
यह संसार ।
इस स्वर की दुनिया का
एक बहका स्वर मुझे मिला ।
जितनी ठेस लगी, इस अंतर में
उतना ही यह,सरस मुखर हुआ ।
यह एकनिष्ठ एकाग्र साधना ।
ज्ञात नहीं श्रद्धा के उड़ रहे, ये अगरु धूम ।
किन चरणों को कर आवेष्ठित, उन्हें अनवरत रहे चूम ।
युग-युग का भटका, यह प्राण पपीहा ।
सदा खोजता, निज आवास रहा ।
थके पंख, नहीं कोई संग ।
सांध्य-क्षितिज पर अटका,
पीड़ित स्वर में रहा, कूंक ।
भरकर अंतर में असह्य हूंक ।
हो रहा वेदना-विगली टूक-टूक ।
पल न कल,
रहा विकल,
इस भरे हुए जन-जीवन में ।
रहा तडपता अपने ही, कंटकित, निसंग सूनेपन में ।
क्षण, देखा उसे श्रेष्ठी पुत्र ने,
ली गहरी सांस । बोला-
समीप ही वेणुवन है ।
तेरा मन अति विषण्ण विपन्न है ।
यहीं कहीं श्रावकों का विश्राम-बाग़ है ।
क्या ?
इन मादक नूपुरों को त्याग,
तुम वहीँ चली जाओगी ।
मन की इस सालती पीड़ा द्वंदों का,
निश्चय ही समाधान पाओगी ।
भर आँखों, क्षण उसे देखा चन्दा ने, बोली ,
भाव विह्वल  रुंधे गले,
ठेस भरे अनमने स्वरों में-
पीड़ा ! मन की पीड़ा !
स्थान-विशेष, उसका निदान नहीं ।
यह, आर-पार उतरी जिसके सीने से,
उसका तन-मन-जीवन, जला वहीँ ।
क्यों जाऊं मैं बेनुवन ! या बृन्दावन !
अंतरवर्हि जल रहे अस्तित्व का कहीं
शीतल अनुलेपन उपचार नहीं ।
अनवरत अहर्निशि चुभ रहे कांटे से
कहीं निस्तार नहीं ।
जानती हूँ ।
ये,मनहरण, देव विग्रह, देवालय, अवतार ।
उस सर्वनियन्ता को पालने के उपचार ।
मात्र, नेति नेति, निराकार साकार के
ये स्पर्श-कातर, रंग ज्वार । 
ये अलौकिक, अद्भुत अनूप रूप ।
निरालम्ब आर्त विकल
शरण खोजता, इनमे ही रहा घूम ।
सब अवतरण ।
उसकी मानव कल्पीय प्रतिकृति, स्वीकृति, अभिव्यक्ति ।
सभी जानते,
“सर्व देवाय नमस्कार, केशव प्रतिगच्छति ।”
अतः किसी  अन्य धर्म, समाज, विचार से
मुझे विरोध नहीं ।
केन्द्रित हूँ जहां,
वहाँ, कोई अवरोध नहीं ।
इन, सामाजिक गर्हित दुरभि संधियों का 
कहीं, कोई, तर्क संगत जवाब नहीं ।
तुम सा, देव प्रदत्त, समाज प्रदत्त, धर्म और राज्य प्रदत्त,
हम, हत् भाग्यों का भाग्य नहीं ।
कहाँ, देवार्चन, पुष्प अभिषेक । आनंदातिरेक । 
कहाँ हम । अश्रु-आप्लावित मौन रहे देख ।
कहीं भी, बरसने वाले शीतल श्याम जलद घन ।
जो अजस्र अमिय, निसृत कर जाते हैं ।
वे, मेरे तक, आते-आते
या तो बनते हैं अंगार,
या उपल बन बरस जाते हैं ।
जो । तेरे मन की वंशी पर,
उतरा,मधु-रस बनकर,
वही, यहाँ छलका, कालकूट हलाहल बनकर ।
एक ही मापदंड ।
सर्वत्र एक से, संतुलन,
निदान, निराकरण नहीं बनते ।
भैषज भी,
मानव प्रकृति, मनः-भावनाओं के,
अनुरूप ही हैं प्रभाव बदलते ।
कभी किसी समस्या का समाधान,
एक ही,प्रश्न, अथवा, उत्तर प्रत्युत्तर,
कदापि नहीं होते ।
प्रश्न !
सदा के रहे अधूरे ।
उत्तर- मूक अपंग ।
दिया न । अबतक, किसी उत्तर ने,
शोषित पीड़ित, दलितों का, संग ।
यह नूपुर ।
यह शिंजिनी झंकार ।
सहस्रार अनहत नाद,
विकसित होते, निर्मल मानस सर में, रजत-स्नात,
ज्योतिर्मय कंज कंवल, अवदात
अनुभूति-कम्पित, विकच पात-पात ।
मानस क्षितिज पर,
प्रज्ञा का उदित मुदित शुचि,
स्वस्तिमय शुभ, आप्लावित अमिय
ज्वार संकुलित, प्रात ।
अभंग तन्मयता, अभेद्य तदात्मता ।
होता, तन-मन एकाकार ।
जिनमे ये प्राण समाहित,
अबतक वह,
अज्ञात अविदित,
फिर भी,
उस, शून्य जगत में स्थापित,
यह शिंजिनी ।
मनः-वेणु बनी ।
जाने किसकी इसमें फूंक पड़ी ।
यह शाश्वत स्वर ।
यह अनगुंज गूँज ।
यह थमे, या छूटे प्राण ।
अब तो । यह विवशता है ।
देखते नहीं नित्य,
मौन निभृत निःशब्द नील गगन में,
जब, चर-अचर सब थककर, सो जाते निद्रा में ।
अर्धरात्रि में, एकाकिनी विभावरी । बनी,
बावरी, नीलाम्बर के प्रांगण में,
सघन-नक्षत-नूपुरों की शिंजिनी पहन,
करती है नृत्य ।
पग, अविराम निरंतर,
प्रकृति स्वर तालों पर चलते-चलते,
हो जाते हैं रक्त रंजित,क्षत-विक्षत,
टूट-टूट, गिरते, मौक्तिक से नखत ।
किन्तु ।
नृत्य नहीं थमता है ।
काली चादर से मुख ढंककर,
किंचित उससे हटाकर निर्यक होकर,
अपलक सजल अश्रुपूरित आँखों से,
चाँद उसे निरखता है ।
ढल ढल आंसू गिरता है ।
खड़ा मौन धनञ्जय,
बोला अस्फुट स्वर मे –
तुम ।
जो भी कह लो ।
कहा नहीं प्रभु ने ।
यह मात्र आत्म-अभिव्यंजना है ।
स्वतः को,
प्रत्युत्तरित प्रतिबिंबित कर लेने की,
यह,मनमोहक छलना है । 
केवल, आत्म वंचना है ।
बलात आकृष्ट होकर दीपंकर सरिस
लालसा लपटों में जलना है ।
बोली गंभीर मुद्रा में चन्दा-
भाव-वैषम्य, विचार निकष-परख ।
विभिन्न दृष्टिकोणों के, होते हैं आत्म-दर्पण ।
जो, जिस रूप में, जहां हुआ समर्पण ।
प्रव्रज्या,
स्पृहा-रहित है ।
इस एकांत एकाग्रता में भी,
सब द्वार बंद ।
प्रवेश, निषिद्ध है ।
एकात्मता,
कब ऐश्णायों से होती बिद्ध ।
एक लक्ष्य ।
एक भाव ही अभीष्ट ।
किया जिन्होंने, सत्य-स्पर्श ।
विचार रहे उनके, सदा निष्पक्ष ।
किन्तु ।
वह ।
विराट ।
वह सर्वनियंता ।
कितनी ज्वलंत मुखर, उसकी, आत्मभिव्यंजना ।
रवि शशि, ये समस्त भुवन ।
प्रगट अप्रगट, खगोल लोक ।
रहा मौन नत् उसे विलोक ।
जड़, चेतन सबमे निवास ।
संहार, सृजन, विलयन, मादक लास ।
गिरि, गह्वर, विजन, उपवन ।
सागर-उद्वेलन ।
हिमगिरि किरीट, सत् सहस्र्रंग ।
सबमे ।
आलिप्त, निर्लिप्त, निहित, निष्कृत,
क्या, यह, नहीं उसका अहम् ।
विकीर्णित सबमे भर,
अपना, नैसर्गिक भाव-तरंग ।
क्यों नहीं, ऐश्नाओं की
सहस्र-फण-प्रच्छायित शय्या में
अपने ही उत्ताल तरंगित विचार-उदधि के,
दुग्ध-धवल-जलधि में,
रहा सदा ही, सुशुप्त शयित ।
क्यों ?
दर्पण, उसकी बनी, समग्र सृष्टि ।
क्यों ?
किसके निमित्त, यह, आत्म-ज्ञापन ।
स्पृहायें रहें या नहीं रहें ।
करता, सबमे वह अयन ।
घूम कर बोली- श्रेष्ठी पुत्र ।
धन्यवाद ।
तुमने व्यर्थ ही किया,
यह प्रलाप सहन ।
अच्छा हो ।
मुझे तनिक दे दो एकांत ।
क्षण उसे निरख, बोला वह –
मात्र अपेक्षित एक प्रश्न का उत्तर ।
लौटूंगा मैं सुनकर सत्वर ।
यह कला ! यह रूप !
क्या निरुत्तर ही रह जाएगा ।
दोनों ही, जन-मानस-अनुमोदन-कान्क्षित हैं ।
आँख उठाकर चन्दा ने देखा ।
किंचित आयी स्मित रेखा ।
बोली- औरों की नहीं, मैं अपनी कहती हूँ ।
यह तन-मन-जीवन । प्राण-यज्ञ-हवन ।
मैं उसका हविष्यन्न, अगरू, धूम, चन्दन ।
पुलकित विकसित सुरभित हृद-नंदन-वन ।
छूकर उसकी, एक मृदुल छुवन ।
सीमित-सत्य-संध सौदर्य ।
अनंत कमनीय-समर्पित होता है ।
नूपुर स्वतः रसः-पूरित ।
लावण्य उत्तरोत्तर उर्जस्वित होता है
इन्हें क्षणभंगुरता नहीं ।
यह चिरंतनता का कांक्षी होता है ।
अतः श्रेष्ठीपुत्र ।
इन नूपुरों में संसृति-हृद-धड़कन ।
निस्वन ।
रूप !
इसपर अनन्त-सुधा-मधु वर्षण ।
दोनों उसकी छाया में ।
कालजयी यह कमनीयता ।
समय-दाह, न जला पायेगा ।
अक्षुण्ण ये नूपुर
इनमें शाश्वत स्वर भरता जाएगा ।
स्मरण रखना ।
दोनों, उसके माध्यम ।
स्वयं में दोनों ही नितांत अक्षम ।
जैसे ही मौन हुई चन्दा,
लौट पडा धनञ्जय ।
सूना था, विजन प्रांत ।
मन था, पीड़ित श्रांत विभ्रांत ।
जीवन-विटप पर, बैठा,
पथ-श्रांत प्राणों का पंक्षी,
एक-एक तृण,
चंचु से नोच-नोच कर देख रहा था ।
कितने तीखे कांटे चुभे निहित,
इस जीवन-चषक परिधि में ।
ढल-ढल बह रहे थे अश्रु,
देखा, अश्रु-आप्लावित आँखों से, चारो ओर ।
लेकर गहरी सांस, बोली मन ही मन ।
आह ! पड़ी कैसी ठोकर ।
गिरी भूमि पर निराधार, औंधी होकर ।
यह उन्नत दर्पपूर्ण प्रतिस्पर्धित भाल ।
लगा इसपर एक काला टीका ।
सदियों के,
कटु व्यंगपूर्ण विषाक्त हास के संग आया,
माथे पर,
ज्वलित अंगार सा, लग मुस्काया ।
यह ।
मैं थी ।
यही मिला था उपहार ।
केवल ।
विवश मौन रहने के,
मेरे समीप, संबल ही क्या था ।
चिर दिन के साथी,
ध्वस्त अभिलाषायें, बहते आंसू ।
ये नयन नीर ।
भर असह्य पीर ।
जब भी आहत निकले, निसंग बहे ।
मिले, पथ पर स्मृतियों के कितने भी पड़ाव ।
वे, निरावृत्त, निसंग, तपे, जले,मिले ।
कभी न रही उनपर, कोई
पल्लव-प्रच्छायित, शीतल श्यामल छाँव ।
इस प्यासी बंजर धरती पर आ पड़ी,
कहाँ से क्षुद्र-घंटिका ।
नितांत दुखिता ।
पीर भरी थी, इन झंकारों में ।
लय-सुर-तालों के, तानों-बानों में,
मैंने भी अपने आंसू से,
इसमें मनमाने रंग भरे ।
जाने कितने जन्मों के तंद्रालस,
कहीं पड़े,
प्राण-वेणु में टीसों के नए नए आलाप उठे ।
तन, रहा यहीं पड़ा ।
मन, समस्त भुवन,
भ्रमण कर आया ।
देखा ।
अश्म बने पड़े अनगनत टुकड़ों में,
प्रलय-प्रताड़ित, भुवन-खंड । बिखरे केशों में,
जीर्ण शीर्ण वसनों में,
दोनों कर से मुख ढँक कर रो रही थी,
उसांसें भारती दीन सी, प्रकृति,
जाने कैसा,
क्यों, उसको मिला,
किससे, यह दंड ।
देखा ।
प्रलायांकित क्षत-विक्षत पड़े, अवशेषों को ।
अब भी दहले हुए मौन, सिसकते से हैं ।
किसी, अन्य अप्रत्याशित से आतंकित,
भयभीत चकित व्यथित से हैं ।
भारी चरणों को रखता,
समय,कुचल गया ।
उसके पद-चिन्हों को निरख-निरख,
है भयभीत सशंकित ।
तांडव कर गया शंकर ।
काँप रही प्रकृति थर-थर,
छिड़ा, विश्व-वीणा में,
पीड़ा का, झंकृत करता मारक मार्मिक स्वर ।
चेतना, सुषुप्त आहत,
ले रही हौले-हौले करवट ।
धीरे-धीरे, उठकर,
अश्रुभरी आँखों से देखा सर्वत्र,
सब कितने टूटे बिखरे हैं ।
किस तरह व्यथा में तड़प रहे हैं ।
हर टुकड़ों को उठा-उठा कर,
ममता के हाथों से सहला कर,
पुनः उन्हें, जोड़-जोड़ कर,
सर्वांग बना लेने की, चिंता में है,
सतत निरत ।टूटा,
कभी पुनः नहीं जुटता ।
उसका पुनर्निर्माण सदा होता है ।
पर मन ।
कब ।
ममता का यह विछोह, सह सकता है ।
जो बीत गया, उसे पा लेने की,
यह कैसी अवश कातर पीड़ा है ।
व्यथा की निसृत निसंग विरल घाटियों में,
घूम रहा मन,
थकित विपन्न विषण्ण ।
जाऊं कहाँ ।
कहूं किससे ।
इस व्यथा विक्षिप्त, मन ने,
अब तक कितना क्या क्या झेला है ।
आश्वासन के, आमंत्रण देते, समस्त प्रतीक ।
दीखते नितांत,व्यलीक ।
क्या मिलेगा ।
कहीं भी जाकर ।
वह ।
पूजन-प्रतीक हो,
या तपः-भूमि हो ।
सागर की महोर्मियाँ हो,
या सरिता की मृदुल वीचियाँ हो ।
मन में, बस एक ही, अनगूंज गूँज ।
जहां हो गयी समस्त संवेदना, अचल ।
नहीं कर सकती, कोई रंग लहरियां अब चंचल ।
बंधी, जिससे यह स्वांसों की डोरी ।
जिसने दी, यह उजली चादर कोरी ।
उन्हीं, पावन पदतल के नीचे,
पावड़ों सा बिछ जाना है,
गोपी-चन्दन सा लग जाना है ।
तर्क कुंठित, श्रद्धा सस्मित,
अमृत, लहराता आप्लावित ।
समस्त, रूप अरूप कारण-भूत,
संज्ञाएँ, मात्र, उसी सत्य की है ।
वह ।
है, संहार-सृजन,
विविध रूप में, कर्ता, हर्ता,निर्माता,
सर्वत्र व्याप्त,
फिर भी, अज्ञात,
वह ।
यह, संघातिक मर्मान्तक चोट ।
सका, न कोई, अवरोध रोक ।
अप्रतिहत गति ।
सबमे निहित ।
वेदना ।
वेदना की ।
व्याकुल आर्त, कराह है ।
पर, पीड़ा को देखा किसने ।
प्रत्यक्ष मात्र, प्रतिक्रया ।
वही है ।
वह ।
सर्वनियन्ता ।
वह ।मेरा ।
एकांत, पल्लव-प्रच्छायित-सघन-शीतल,
स्नेहिल निवास ।
जला, उन्ही चरणों में यह निश्कल्मष आत्म-प्रकाश ।
मेरा जन्म-जन्म का, अडिग, दृढ़, विश्वास ।
मैं ।
उसकी छाया में निर्भय ।
वह ।
अप्रत्यक्ष ही रहा, कितने रूपों में,
किन्तु रहा, परम सदय ।
आज भी, जो चोट मिली ।
नव-ज्ञानोन्मेष का उज्जवल प्रभात मिला ।
प्रेरणा, उषा सी, मनः प्रांगण में उतरी ।
मैं ।
पीड़ित अंत्यजा ।
स्वास-स्वांस से, उसे समर्पित ।
मनःकालिंदी में वह वंशी धुन गूँज उठी ।
मैं कर्षित, मन्त्र-मुग्ध, रही थिरक,
मेरी क्षुद्रघंटिका खनक उठी ।  
अनुभूति अमिय कलश में डूबी,
यह शिंजिनी, इसे,
कालकूट हलाहल का लहराता पारावार मिला ।
यह, लहर लहर पर नाच उठी ।
शरत-चन्द्र-चषक, में भर गरल,
कर, आकंठ पान,
यह मत्त मयूरी सी नर्तित,
भावों के सजल श्यामल नील नीरद में,
अपांज्योति सी झूम उठी ।
यह सम्पूर्ण भुवन ।
मुझ रंगिणि का उसमें नर्तन ।
कला ।
केवल कला ।
इसके पावन पुनीत चरणों में,
आमरण आजन्म, यह जला ।
जीवन झुका ।
ह्रदय ।
आमूल अंतरवर्हि विदग्ध वेदना विष बुझा ।
नितांत निसंग,
मैं निर्भीक निश्छल ।
जन्म जन्मान्तर का
यह प्राण तृषित विकल ।
केवल सत्य-संधान लक्ष्य अतल ।
अनुभूति-अपांज्योति, मनः-नीरद पटल ।
तपः-यजन ।ज्वलित आत्म ज्योति निष्कल ।
उस ।
महत परम प्रसादमय अवकाश तले ।
यह, निसंग निभृत लघु दीपिका जली ।
उस महार्णव में घुलती मैं क्षुद्र डली ।
नितांत अजस्र अनुभूति तुहिनाश्रु पली ।   


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