घोर निस्तब्धता
छायी,
मगध राज्य सभा में
।
जब, सिंहासन पर
अधीष्ठित,
राजा बिम्बसार का
स्वर,
गूँज उठा क्रोधित
।
नृत्यांगना रूपसी
चंदा,
प्रांगण के मध्य,
मौन खड़ी थी ।
तुरंत, चंदा के
प्रति,
मृत्यु दंड की
घोषणा हुई थी ।
थी,
स्तब्ध जडवत
नृत्यांगना ।
उमड़ती स्वासें,
आंदोलित वक्ष ।
चकित विस्फारित
आँखे अपलक ।
झूल उठे, लहराते
मणिधर से विष प्यासे,
मदमाते लम्बे
बिखरे कृष्ण केश ।
अस्त व्यस्त समस्त
सुसज्जित, परिवेश ।
कांपती सी गिरी,
ग्रीवा की मौक्तिक
बहुमूल्य सृका ।
टूटी केशों की
पुष्पित अनुस्यूत वेणी ।
शांत पड़ी चरणों की
शिंजिनी ।
नत आकर्णमूल,
पद्मपलाक्ष,
निरीह कम्पित
अश्रु बिंदु, रहे झाँक ।
मुख पर, ले रही थी
करवटें,
पीड़ा की अनगनत
रेखाएं,
अबोल बोल, अति
मुखर मूक परिभाषाएं ।
सहसा, उसने शीश
उठाया ।
स्पष्ट खुल नील
नयनों में,
दो ज्वलित मशाल,
उद्दीप्त प्रखर
प्रकशित प्रभासित लहराया ।
निरख उसे ।
राज प्रांगण आकम्पित
थर्राया ।
आँखों के जल में,
दो जलते दीप जले ।
या सागर-ज्वारों
की लहरों से,
विद्युत् टकरा कर
शत-शत टुकड़ों में
तड़प उठे ।
अश्रु, हो उठे
पलकों में जडित,
ज्यों दो मोती चमक
उठे ।
सहसा, भावावेगों
की आंधी में,
पीड़ित रोष, लहराया
।
टीसों से आकुंचित,
आरक्त कसे अधरों
पर,
बल पड़ आया ।
निर्भीक दृष्टि से
उसने, घूम कर देखा,
सम्पूर्ण भरी सभा
को ।
ली, गहरी सांस ।
सव्यंग मुस्काई,
बोली –
सादर सहर्ष
हार्दिक धन्यवाद, भरी सभा को ।
सटीक सार्थक उचित
पुरस्कार,
मिला है, कला
पारखी को ।
साधुवाद
विद्वानगणों को ।
मुझे ।कंटक-किरीट
मिला ।
निश्चय ही एकनिष्ठ
तपः-साधना मेरी,
मुझको, मेरा
अभीसिप्त अभीष्ट मिला ।
यदि अन्यथा हुआ
होता ।
हुई कहीं एकनिष्ठ,
अराधना में त्रुटी, या खामी ।
चोट मुझे दे जाती
।
कला को, सदा यही उपहार
मिला है ।
उसका, अति दुर्गम
बीहड़ संसार रहा है ।
काँटों में अश्रु
पिरोना,
विद्युत्-टीसों
में मुस्काना,
श्याम जलद दुकूलों
में,
उद्वेलित ह्रदय
छिपाना ।
प्रकृति से, यही पाथेय
मिला है ।
कला,
पीड़ा की
शुक्ति-कारा में कैद,
अनुभूति-अश्रु-प्रताड़ित,
स्वाति-कन है ।
हाहाकार मचाता
अदम्य,
तरंगराज का,
वाडव-ज्वाल प्रज्वलित,
अन्तर्निहित अजस्र
रुदन है ।
महती कांक्षाओं
का, मूक अश्रु-हवन है ।
यह मात्र,
रस-मर्मज्ञों की,
अति मसृण
मर्मान्तक कोमल धड़कन है ।
एकाकी उदय-अस्त
होते नखत का
अवहेलित नियति
प्रदत्त क्षरण है ।
प्रज्ञा और
अनुभूति का,
परस्पर
ह्रदय-निवेदित, संवेदित, गाढ़ालिंगन है ।
विलम्ब क्यों ?
मैं खड़ी यहाँ,
मेरे प्राणों की
पुष्पांजली,
आज, कला के चरणों
में,
सनत समर्पित होगी
।
उस विजयनी के
चरणों में,
इन प्राणों की
अनुरंजनी, शिंजिनी बंधी होगी ।
जाने कितने जन्मों
की,
अनुत्तरित अनकही
व्यथा
उन चरणों में
लिपट, सिसकती,
अपनी रिसती पीड़ा
का स्नेहिल उत्तर पाती होगी ।
कलाकार !
कभी के,
सीमा-असीम, जन्म-मरण से,
पार, हो चुके रहते
हैं ।
सत्य-गवेषणीय-चंचरीक
।
उड़ते दोनों पक्ष,
जन्म-मरण होते हैं ।
उसका रस-मर्मज्ञ
ह्रदय,
वह सत्य का मधु
रस,
आप्लावित अमिय का,
तन्मय होकर,
रसः-स्वादन करता है ।
संग संग चलते हैं
जन्म-मरण ।
जिसे, जब भी, वह ,
चाहे,
तटस्थ
निर्द्वंद्व, करे वरण ।
दोनों के रहस्य,
स्पष्ट खुले पृष्ठ,
उसके सम्मुख होते
हैं ।
अतः विलम्ब क्यों
?
मिटटी को, मिटटी
में मिल जाने दो ।
अज्ञात काल का
कैदी, प्राणों का पक्षी ।
उसे हर्षित मुदित
पंख फैलाकर, उड़ जाने दो ।
था उद्दीप्त भाल,
तना, कम्बुकंठ
लम्बी ग्रीवा । नील-नयन,
निर्मल निश्च्छल
अतल, वारिधि में,
अभूतपूर्व वेदना
की वृष्टि ।
सजल सघन श्यामल घन
में,
कम्पित दामिनी
झलमल ।
नील स्वर्ण खचित,
बहुमूल्य
सूक्षाम्बर में,
आवेगपूर्ण, आवेशमयी
उच्छवासित,
कमनीय कोमल कल लोचभरी,
शातोदारी,
अरुणाभ अवदात
जलजात सरिस, देह यष्टि ।
रसराज निवेदित
मादक मंजरी ।
रही वह,
स्पष्ट बिम्बसार
को अनिमेष, निरखती,
दोनों कर की बंधी अंजलि
में,
मांग रही थी
पुरस्कार,
प्राण-दंड ।
सहसा हुआ कोलाहल,
हटे, किनारे सत्वर
सभी राजगण सभासद ।
निज चारिका की
श्रंखला में,
किया,
प्रभु ने भिक्षुओं
के संग,
अकस्मात्, राज-सभा
में पदापर्ण ।
प्रथम दृष्टि
मिली, चन्दा से ।
वह प्रांगण के
मध्य खड़ी थी ।
ज्यों, बादल से
विद्युत्, टूट गिरी थी ।
विधु से, चांदनी
बिछुड़ कान्तिहीन हुई थी ।
या शापग्रस्त,
भस्म-कंदर्प-दर्प निरख,
काष्टवत्, रति ,
जडित हुई थी ।
वह, थी । पीड़ा, करुणा,
तिरस्कार, उपेक्षा की,
साकार ज्वलंत
प्राणवंत, जीवंत मुखर, प्रतिमा ।
नृत्याभूषणों से
सज्जित,
अश्रु-निमज्जित,
नैसर्गिक कमनीयता,
लावण्यता की,
सौष्ठवपूर्ण गरिमा ।
चरणों की शिंजिनी,
धरा पर पड़ी थी ।
मेखला विश्रृंखलित
क्षीण कटि में, अटकी, झूल रही थी ।
सम्मुख थे, प्रभु
।
काषाय वसन, चीवर,
मृण भिक्षा पात्र, कर में लेकर,
परम ज्योतिर्मय
उद्दीप्त उज्जवल प्रभा,
उत्फुल्ल
स्वर्णप्रभ जलजात ।
ज्यों, नील तडाग
में,
सद्दः खिला ।
सात्विकता का शुचि प्रसाद ।
सर्वत्र व्याप्त
हुआ ।
जो था जहाँ जिस रूप
में,
अचल मंत्रमुग्ध
था,
शास्ता को, अपलक
निरख रहा ।
खो उठी चेतना,
कहाँ, रहा मन ।
कहाँ रहा तन ।
नहीं किसी को बोध
रहा ।
सहसा, गंभीर गहन
मृदुल कोमल स्वर,
गूँज उठा ।
बड़ी दूर से आ रहा
हूँ ।
मार्ग से ही अति
तृषित प्यासा हूँ ।
सहसा चौंके सब जन,
जिसके हाथों में
जो, सहज उपलब्ध,
लेकर दौड़े सब
तत्क्षण ।
स्वर्ण पात्र,
स्वर्ण झारी, में लेकर जल,
खड़े हो गए,
नर-नारी ।
मुझे ।
तृप्ति अपेक्षित
है,
तृप्त भी होऊंगा ।
किन्तु नहीं जल
वांक्षित तुम सब से ।
वह ।
किशोरी,
जो अब तक मौन
विषण्ण खड़ी ।
जल लूँगा मैं उससे
।
चौंकी चंदा ।
आमूल कंपी लतिका
में,
रात्रि प्रहर का,
संचित,
सब जल बिंदु सहसा,
एक साथ,
अचानक अबाध झरा ।
अश्रु आप्लावित,
भींगा मुख,
ज्यों जलनिधि में
डूबा विधु ।
शीश झुका ।
दोनों कर जुटा ।
नमित व्यथित अति
भींगे भरे गले से, बोली-
प्रभु !
जल में
जितने भी, डूबे गागर ।
कभी न
भर सके पूरा सागर ।
हाहाकार
मचाता, गगन घर्षित तरंगित रत्नाकर,
कभी
अपनी बाहों में क्या,
भर
पाया, निशिकर ।
प्रभु !
सौन्दर्य व्यर्थ !
गुणवत्ता व्यर्थ !
एक ही परम सत्य ।
मैं ! अस्पृश्या
बाला !
छलकते अमिय में,
गिरी, विषाक्त-सीकर की ज्वाला ।
मैं ! पतित अंत्यजा
।
केवल, ये झरते
अबाध अश्रु ।
कर सकते हैं ।
तव पुनीत पवित्र
पद-प्रक्षालन ।
प्रभु !
ये लम्बे काले
कौशेय केश बिछा दूं ।
उन्हें ।
तव चरणों के कोमल पावडे
बना दूं ।
जितने शूल चुभे
चरणों में,
जितने रजकण भरे
पदः त्राणों में,
उनको, इन पलकों से
सहज उठा लूं ।
इतना ही है,
अधिकार मुझे ।
रही सदा की रीती
गागर ।
इतना जल बरस गया,
अम्बर, इतना आबाध
रहा,
जलनिधि-लहर,
उछल-उछल ।
नहीं कोई, कूल
किनारा ।
मौन रहे सब, निज
अंतर जल भर-भर ।
नहीं, अभी तक,
कभी किसी ने,
मुझे पुकारा,
हर तट पत्थर ।
हर निर्झर निर्मम
।
वह पावन जल क्यों
कर पाऊँ ।
कैसे यह तृषा
बुझाऊँ ।
मैं कैसे गंगा बन
जाऊं ।
कैसे अंशुजा की
गहनता भाव प्रवणता पाऊँ ।
तव पावन पुनीत पद
कंज तले,
प्रज्ञा-ज्योति
जलाऊँ ।
मैं कैसे वाणी बन,
सरस्वती का
अनुरागी जल पाऊँ ।
झर रहे उन्मुक्त
शुद्ध जल प्रपात ।
बह रही अबाध
कुल्याएँ सरिताएं ।
अवश मैं फिर भी,
वह जल कहाँ से
पाऊँ ।
सदियों से, पट बंद
मिले उनके ।
क्यों कर मैं घट
भर पाऊँ ।
प्रभु ! मैं,
शुद्र, पद दलिता नारी ।
युग-युग से, उच्च
वर्ण द्विजों से हारी ।
यह,
प्रभु-आकांक्षा ।
और मेरी मुर्मुष
तितिक्षा ।
सदियों का वर्जित
अधिकार,
कहां से, क्षण भर
में पाऊँ ।
तव पावन श्री
चरणों की सेवा से,
क्यों कर हो, यह
हत् भाग्य जीवन सफल ।
इस संत्रसित
व्यथित, जीवन-मरण से,
किस प्रकार विमुक्ति
आऊँ ।
मैं अभागिन ।
वह भाग्य कहाँ से
लाऊँ ।
जो,
इस आप्लावित
स्नेह-सुधा-सागर में,
निज,रीती अंजलि भर
पाऊँ ।
पद-रज पराग सी,
मैं तव पथ पर बिछ
जाऊं ।
जहां अवस्थित हैं,
प्रभु ।
उस परम उच्च आसन
तक,
कैसे, ये कपते डग
भर पाऊँ ।
प्रभु ! धूलि,
धूलि होती है ।
वह कब चन्दन की
गरिमा से भरती है ।
हर कोई, उसे कुचल
कर जाता है ।
पतझारों का तीखा
काँटा भी,
उसमें बिछ जाता है
।
हर बार तिरस्कृत,
पद-भर दलित, पीड़ित,
धरती का अन्तर-दह
तक, भर-भर जाता है ।
फिर भी , वह ।
उपेक्षिता ।
घोर तमिस्रा आँखों
में भर कर,
काली रातों में
स्वप्न कँवल संजोती है ।
उलटी सीधी तेज हवा
।
वर्षा आतप शीत से,
शरीर, तपित और
कम्पित, जला,
ठिठुरा, रह जाता
है ।
वह ।
मौन ।
सिसक सिसक, रह
जाती है ।
यह धरती ।
संहार-सृजन, हुए
कितनी बार ।
वह । कुचली गयी
अगणित बार ।
जाने कितनी बार
जली, अरमानों की होली ।
उड़ी राख बन ।
मिली पवन में,
जली अग्नि-कन, बन
दग्ध गगन में ।
जब भी जल में
बहकर, गिरी, जलनिधि में ।
रही गलती,
लवण-पाषाण बन कर,
उसके अतल अंतर
में,
उसे भी लहरों ने
ठुकराया ।
नहीं, धरा, नहीं
पवन, नहीं गगन ।
क्या कभी कहीं
किसी ने,
उसे, साग्रह
अपनाया ।
बनकर, मिट कर भी,
बन न सकी, कदापि वह ।
उन्नत ललाट की
रोली ।
वही उपेक्षित
व्यथित तिरस्कृत, चरण-रज हूँ,
मैं ।
हर वर्गों की ठोकर
मुझे मिली ।
हर ऋतुओं की तीखी
तेवर से,
सदा सतत बिंधी ।
फिर भी अचल अडिग
अवस्थित,
वहीँ रही,
जहां, उंच नीच
सबकी,
चिता, एक संग जली
।
जाने किन जन्मों
का संचित पुण्य ।
मेरे अंचल में,
उज्जवल वरदानों सा,
गिरता, गिरता,
आते जाते ज्वलित
अभिशापों के जलते,
अंगारों से, भर
उठा ।
मैं ।नितांत
दीन-हीन अंत्यजा ।
क्यों,
कला नैपुण्य का
पादप रसाल,
इस, नीरस सैकत-वन
में उपजा ।
क्यों हो उठी
दोलित,
रसः-आप्लावन में
आकंठ स्नात ।
प्राप्त, वह दंड ।
अप्रत्याशित अज्ञात ।
प्रभु ।
स्वाति जल बूँद
भी,
स्थान-विशेष से
ही, समादृत होती है ।
अर्हि के
विस्फारित मुख में पड़,
मर्मान्तक विष हो
जाती है ।
मैं, बनी न
गजमुक्ता,
बनी न कदली-कपूर ।
बनी गरल,
विष-ज्वाल-प्रमत्त-भरपूर ।
यह । कला ।
अमिय कहीं होगी ।
पता क्या था ।
मेरे निमित्त ।
यह ।
प्राणान्तक शर्तों
में बंधी मिलेगी ।
किसी कला से
बंधना,
आजन्म
स्वांस-स्वांस में, उसके हांथों है बिकना ।
तन-मन-जीवन, दग्ध
विकल ।
अंतरदह तक पहुँच
चुकी अगन ।
यह आग ।
भला क्यों कर बुझ
पाए ।
बीते जितने भी
जन्म-मरण ।
यह वर्तमान और
आगत,
सब करबद्ध प्रणत,
इसमें आये, शीश
झुकाए ।
समझे कौन ।
यह व्यथा निरंतर
असह्य मौन ।
बिंधा जिसे यह
तीक्ष्ण पृषत्क ।
कह न पाया वह ।
इसकी पीड़ा कितनी
गहन ।
मर्मान्तक अथक ।
पल एक थमे न,
रिसती टीस ।
अनगनत सुईओं की
अनवरत चुभन कसक ।
मंत्रमुग्ध विभोर
मनः-कानन ।
गंध-अंध-आकुल गया
महक-महक ।
यह प्रगाढ़ तन्मयता
।
अग जग की सुधि
ध्यान
भला क्या कभी रहा
।
यह सांसारिकता
मुझसे ।
मैं लोकाचारों से
सतत रही अनजान ।
मैं ।
कला की सोपानों
में चढ़ ।
गयी कहीं, अधिक
आगे बढ़ ।
अब शिंजिनी नहीं,
यह स्वर, अक्षर ।
मुझे कहीं अधिक
पागल करता है ।
जो । अनगूंज गूँज
गुंजित मन में,
वे ।
बांध न सके किसी
बंधन में ।
शिंजिनी, कर्णिका,
तूलिका,
मात्र, एक कमनीय
कलात्मक माध्यम है ये ।
उस परम सत्य संधान
में ।
प्रभु ।
आप दयामय करुणामय
।
कोटि-कोटि,
सात्विकता का पारावार,
तव चरणों में नत
विस्मय ।
यह प्रखर प्रज्वलित
विशाल व्यापक प्रकाश,
अनंत अविराम
विकीर्णित ।
हो ।
कोई कुटीर । कोई
हर्म्य ।
सब, एक सामान
प्रकाशित ।
प्रकाश भेद नहीं
जानता ।
किन्तु,
महलों की अपार
समृद्धि, अहंकार ।
झोपड़ियों का घुटता
मर्मान्तक अन्धकार ।
दोनों को, स्पष्ट
उकेर कर रख देता है ।
उनकी स्थिति, सटीक
संतुलित,
पक्षपात-रहित,
प्रकट कर देता है ।
अतः
प्रभु ।
प्रकाश हो या
अन्धकार ।
आनंद हो या हो
व्यथा-भार ।
दोनों ही नियति
घर्षित मर्दित चरण ठोकरों पर ।
ठोकरों से, निस्सहाय
निरुपाय को,
उसकी असमर्थता
विवशता को,
और अधिक गहन चोट
दे जाते हैं ।
प्रभु ।
तव तृषा शमन करूँ,
खड़े जितने भी
गणमान्य,
सबको घनी उपेक्षा
से भरूं ।
और स्वयं को,
अत्यंत महत्वपूर्ण
जान,
अंतर में,
अवर्ण्य असह्य
अबाध, अहम जगाकर,
कातर, कम्पित, जीवन
डोर को,
कान्तर कंटक-वन
में, और जटिल उलझा लूं ।
नहीं ।
बीतराग ।
उदीप्त प्रसाद ।
नहीं ।
जैसी हूँ । वैसी
ही रहने दें ।
मत जल देने को,
इस आकिंचन को
बाध्य करें ।
क्षण अंक बंद
दोनों
करबद्ध प्रणत बोली
वह मन ही मन-
मैं ! वीणापाणि के
चरणों में बंधी, शिव-शिंजिनी में ।
तू ! अनंत शून्य
के अरण्यों में ।
एक गवेषणा ।
एक साधना ।
माध्यम भले ही हो,
अन्य-अन्य ।
सबकुछ प्रभु
मनः-मुकुर में,
निर्मल स्वच्छ उभर
आया ।
बोले सस्मित-
दीपक जो, जहां भी
जलता है ।
वह,
सत्य-साक्ष्य-प्रतीक होता है ।
किन्तु ।
कोई भी कला ।
मात्र ।
आत्म अभिव्यक्ति
है ।
यह, अपार, अबाध,
अतृप्ति अतृप्ति ही है ।
केवल, तन-मन का
सौन्दर्य प्रसाधन ।
ममत्वपूर्ण, अंध
अहम का, ज्ञापन है ।
आत्मकेंद्रित
तन्मयता का चरम,
स्वतः अभिव्यंजना
का माध्यम,
साहन है ।
इसमें,
उजर्स्वित
निवृत्ति कहां है ?
कोई भी,
ज्ञानोंन्मेष
कभी शब्द, सीमा,
रूप, आकार, प्रकार में,
लिपि-कलेवर सीमा
में,
कदापि नहीं होता
आबद्ध ।
ज्ञान-ज्योति
प्रखर भास्वर,
उत्ताल तरंगित
अप्रतिहत वारिधि,
अपार अनन्त
स्वच्छंद ।
मन्त्रदृष्टाओं ने
किया,
केवल,
ज्ञानानुभूतिओं का अवगाहन ।
परा, पश्यंती
वाक्,
मात्र, योगियों के
हैं संवाद ।
इतर प्राणी
अनिभिज्ञ इनसे,
वे हैं इसके अपवाद
।
ज्ञान-यज्ञ में
समस्त वृत्तियाँ होती है भस्म ।
सत्य-प्रकाश
निर्वात निष्कंप अचल ।
समय-चक्र में,
नित्य अनित्य कभी
नहीं रहे, एक सरिस ।
दोनों का ही होता
क्षरण ।
प्रकृति में पल
प्रतिपल अनवरत,
परिवर्तन ही
परिवर्तन ।
अतः किसी भी,
मानवीय संवेदना को,
न कर प्रव्रज्या
से तुलना ।
आत्मअभिव्यंजना ।
साधन नहीं ।
अनगनत जल वीचियों
के दर्पण में,
मात्र, स्वयं को
है निरखना ।
यह मृग तृष्णा है
। छलना है ।
आत्म वंचना है ।
सत्य से कहीं दूर,
केवल,
लालसाओं की जलती
लपटों में,
मुग्ध शलभ सा,
बलात् पतित होकर
जलना है ।
स्पृहा । ऐश्नाएं
।
भला कभी साधना
क्यों कर, होगी ।
आत्म स्वीकृति का
अनुमोदन ।
कदापि नहीं करता,
जटिल इच्छाओं का
भंजन ।
आत्म-तपः !
निर्विकार निष्काम
एकनिष्ठ एकाग्र,
सत्य-शोध विधा है
।
अतः यहाँ,
क्षुद्र, अहम को स्थान कहाँ है ?
दे । शीघ्र जल दे
।
अब मत कर अधिक
विलम्ब ।
चारिका में निकला
हूँ ।
राह में, जाने
कितने कैसे आर्त विकल मिलेंगे ।
वे क्या-क्या,
अपनी व्यथा कहेंगे ।
अब भी,
आंधी से कम्पित
लता सी, खड़ी रही,
जडित, नमित चंदा,
दोनों कर में
स्वर्ण-जलपात्र लिए ।
कांपते अधर,
आँखों में जल ।
मुख पर पीड़ा की
रेखाएं, आकुंचित मुखर ।
कभी देखती राजगणों
को,
जन संकुलित भरी
सभा को,
कभी स्वयं को,
स्वप्न-विमुग्ध-विसुध,
समझ न पायी वह ।
कि अब भी वह है
जड़ित,
या बढ़ रहे उसके
पग,
प्रभु के समीप, जल
देने को,
मन्त्र विमुग्ध
यंत्र चालित ।
झरित जल, गिर रहे
कहाँ ।
उसे कुछ ज्ञात
नहीं ।
जल पान कर,
अभय दान कर,
किया प्रभु ने
सत्वर प्रस्थान ।
दोनों कर में जल
पात्र पकड़ कर,
चंदा खड़ी रही,
राजाज्ञा को ।
कहा सलज्ज
बिम्बसार ने-
हम सबकी कर
उपेक्षा,
किया जिन्होंने
तुझे समादृत ।
अब हो ही क्या
सकती है,
कोई भी आज्ञा,
उसके निमित्त ।
तू चाहे जहां जा
सकती है ।
मुझे नहीं है कोई
आपत्ति ।
अबतक धनञ्जय
श्रेष्ठी कुमार,
मौन खडा निरख रहा
था सभागार ।
देखा उसने, चंदा
को,
सहज चमत्कृत होकर
।
चंदा ।
सागर की रोषभरी
आंधी सी,
पावस की अबाध
अप्रतिहत, वेगवती सरिता सी,
तत्क्षण सत्वर
क्षिप्रगति से,
राज सभा से बाहर
आई ।
उसके पीछे लम्बे डग
भरता,
अस्फुट स्वर में
साग्रह अनुनय करता,
श्रेष्ठीपुत्र
धनञ्जय भी आया ।
इस समारोह के,
हम दोनों ही घोषित
श्रेष्ठ नर्तक ।
क्यों न यहाँ के
नियमों से आबद्ध हो जाएँ ।
क्यों रहें अब हम
पृथक-पृथक ।
जो प्रथा चली आ
रही मगध की,
क्यों न सहर्ष
अपनाएँ,
हम दोनों ही परिणय
में बंध जाएँ ।
घूम कर देखा,
चंदा के,
उद्दीप्त हो उठे
रोष से, अश्रु भरे लोचन ।
घुमड़े नयन क्षितिज
पर, कजरारे नीर भरे बादल,
और तड्पी बिजली,
तत्क्षण ।
हतप्रभ हुआ
श्रेष्ठीपुत्र,
देख, बादल बिजली
की तड़प द्रुत एक संग ।
उमड़े, तीव्र
आक्रोश के,
पलक कोरों पर सप्त
रंग ।
नख से शिख तक,
हो उठी, निज असह्य
विष से कम्पित ।
दोलित अंग-अंग ।
अधरों पर, एक
पीड़ित विषैली आकुंचित, मुस्कान ।
आने वाले विप्लव
का आह्वान ।
बोली सव्यंग अति
तिक्त स्वर में-
श्रेष्ठी पुत्र !
जब, मरण-दंड मिला
था मुझे ।
अंत्यजा होने का,
अभिशाप उदित हुआ
था तत्क्षण में,
संग-संग आकर एक
साथ रुके,
तव कदम, एक पल भी
थमे नहीं ।
सत्वर पीछे हटे
थे, क्षिप्र गति से, सहसा, सहम ।
कहाँ था तुम्हारा
आत्मबल ।
क्यों नहीं सबके
सम्मुख मेरा हाथ पकड़ कहा तुमने ।
अब न करो ये अश्रु
निसृत अविरल ।
कला !
वरदान है ।
अंधी,
मूक, वधिर, हठी है ।
नहीं
देखती, नहीं बोलती, नहीं सुनती,
और ,
कभी न, अपने पथ से हटती है ।
यह अमृत
!
उंच नीच
नहीं देखता ।
भाव-वैषम्य,
नहीं जानता ।
सब पर
एक सरिस बरसता है,
जिसे
यह, मनोनयन करता है ।
कलधौत
कौमुदी की अजस्र बरसात,
खिले
जिसमे, मानस-सरि के बंद, कंज अवदात-स्नात ।
इसे ।
वही
पाते है ।
जो
एकनिष्ठ एकाग्र तपस्वी होते हैं ।
यह,
अर्जुन का मतस्य-वेधन है ।
अटल
ध्रुव नक्षत्र है ।
चिर अतृप्त
पिपासित पपीहे का स्वाती कन है ।
पाते वही ।
जिन्होंने
ज्ञान-यज्ञ यजन किया है ।
पीड़ा की वीणा में,
इसके सस्वर मुखरित ।
कोई भी कला ।
अनायास नहीं मिलती
है ।
जन्म-जन्म के,
तपः-निकष पर,
यह, हिरण्यमयी खरी
उतरती है ।
पाणि-ग्रहण तो दूर
।
मुझे, तेरा साथ भी
असह्य ।
तूने क्या जाना ।
मैं ।
राजाज्ञा
शिरोधार्य करती ।
कदापि नहीं ।
सागर से उद्भूत
हुए अमृत और हलाहल ।
एक तत्व का, यह,
रूप-विपर्यय ।
एक प्राणवंत, दूसरा
मारक ।
तुम !
अब भी, तुम में है
निहित,
घृणित छल का जघन्य
पतित बल ।
जो, अभी अचानक,
प्राप्त हुआ,
इस जीर्ण शीर्ण
जर्जर आँचल में,
गौरान्वित संपदा
का अलभ्य धन ।
उसे ।
इस मधु आवेष्ठित
भाषा से,
करने आये हो अपहरण
।
सदा से, श्रेष्ठ
वस्तुओं के,
अभिजात्य वर्ग
हैं, जन्म-सिद्ध अधिकारी ।
और उपेक्षित
उच्छिष्ट तिरस्कृत अवांछित, के,
हमसब, नत प्रणत
करवद्ध दीन भिखारी ।
बोला अनुनय भरे
स्वर में धनञ्जय-
अभी कहा नहीं तूने
।
कला, कोई वैषम्य
नहीं जानती ।
बोली चन्दा- कहा
था ।
जो विवृत कपाट
निषकल्मष है ।
निर्भीक, अभय,
द्वंद्वरहित,
सदा सदाशय है ।
उदात्त, सरल,
निश्च्छल, अटल,
जिनके विचार
स्वच्छ और प्रांजल हैं ।
तेरे निमित्त
नहीं,
जिनमे भाव वैषम्य
वृत्ति-जाल है ।
जो । उच्च वंश
मर्यादा-दर्प के
विष बुझे सर्प से
दंशित हैं ।
मुझे,
तेरा समाज । नहीं
पचा पायेगा ।
यह अति गरिष्ट
भोजन,
अरिष्ट ही लाएगा ।
मुझसे बंध, समाज
में बंधना,
क्या कभी संभव हो
पायेगा ।
मैं । शूद्रों
में, वह शुद्र हूँ ।
यदि उच्चवर्ग की
गलियों से निकलूँ,
मार्ग, कपाट,
द्वार, धोये जाते हैं ।
यदि प्रातः कोई
मुझे देख ले,
ब्राह्मण को,
ग्रह शान्ति हेतु,
अशुभ-निवारण के
निमित्त, दान दिए जाते हैं ।
मेरी छाया ।
अभिजात कुल
कीर्ति-कौमुदी के पूर्ण चन्द्र को,
राहू सा ग्रस जाती
है ।
मैं ।
वह अंत्यजा हूँ ।
शुद्र ।
नीच वर्ण हूँ ।
वर्जित है जिन्हें
वैदिक अध्वर ।
वेद-वाक्य, श्रवण
कर लेने का, दंड,
कर्ण में उष्ण तेल
मिला था ।
शरीर ।
मेरा हो या तेरा ।
भोज्य है, वह, जलती
चिता का ।
मत निरख ।
रजत स्नात झूमता
नव मल्लिका सा,
यह कमनीय कान्त
गात ।
ये कदापि नहीं,
सद्दः विकसित
तुहिन खचित अरुणाभ, जलजात ।
भले ही बिखर गया
इनपर,
लावण्य-ज्वार का
मत्त प्रभात ।
किन्तु, जन्म-जन्म
से, सदियों से निरंतर,
इनकी जीवन
स्वासें, कर रही पान,
चिता की
कज्जल-कृष्ण-कल्मष-कडुवे-धूम ।
ये ।
आँखें ।
स्वप्नों को भर,
नहीं, कजरारी काली हैं ।
इनमें, अंत्येष्ठि
अग्नि की,
उठती लपटों के
असह्य तपन की लाली है ।
चिता के निमित्त
रखी,
या उनपर ही जली,
समिधायों से अथवा,
जल चुकी चिता के
शेष ज्वलित अंगारों पर,
बनता है, हम,
त्रिशंकुओं का भोजन ।
यह, तन ।
उसी चिता,
उसी राख,
उसी पानी मिट्टी और
अन्न से,
सदियों से उन्हें
पचाता आया,
और हुआ निर्मित है
।
उन
अंत्येष्ठि-यज्ञ से ही,
रोम-रोम अभिसिंचित
है ।
इसमें, तुम ।
अभिजात्य कुलो के
केशर कुमकुम चन्दन की, नहीं सुगंध ।
बसी हुई है इस
काया में, जले, शवों की चिरायन्ध ।
यह तन, सदा
चांडाल-महाभोज को, लालायित ।
इसमें, असमय,
अप्रत्याशित, मृत्यु-प्राप्त,
अतृप्त आत्माओं
के, आहात-अरमानों का रक्त प्रवाहित ।
यह अंत्यज ।
जीवित और मृतक के
मध्य का माध्यम है ।
इसे, आत्मसात कर
पाना, अति दुष्कर, दुर्वह, दुर्गम है ।
मानव ।
मानव होते हैं एक,
किन्तु किस प्रकार
शोषित मर्दित दलित कर,
निम्न स्तर पर,
अवस्थित कर भी,
तुमलोग ।
संतुष्ट नहीं हुए
।
हम सशरीर जीवितों
को ।
प्रेतों की नगरी
भेज दिया ।
कला ।
निर्बंध सिन्धु है
।
इसकी कहीं परिधि
नहीं ।
प्रतिभा ।
प्रज्ञा का नव
ज्ञानोन्मेष है,
इसमें पीड़ा अशेष
है ।
जो इस शर से हुआ
बिद्ध ।
कहीं नहीं उसकी
औषधि ।
कहा धनञ्जय ने
हौले से-
मत कर रोष । मत दे
दोष ।
तुझे लेकर मैं
अन्यत्र कहीं बस जाऊँगा ।
इस समाज को त्याग,
दूर कहीं चला जाऊँगा ।
चौंकी चंदा- इतना
बड़ा त्याग !
बना, कबसे सदियों
का पाषाण ह्रदय, उदार ।
कभी तो तुम ।
मेरे संग,
सामाजिक समारोहों
में, करोगे विचरण ।
नत पलकों में,
तिरस्कार भरी, वक्र भंगिमा,
व्यंग भरी मूक
बनी, अत्यंत विषैली मुस्कान,
आँखों आँखों में,
अवहेलना उपेक्षामय तीक्ष्ण संभाषण का,
मौन आदान प्रादान,
दप-दप, करता उच्च
वर्ग का, असह्य अभिमान ।
क्या कर पावोगे,
निःशब्द सहन ।
हो सकता है, चिरंतन
की चली आ रही निर्ममता ने,
सिखलाया हो, सब,
सह लेने की क्षमता ।
किन्तु ।
मैं नहीं ।
मुझमें नहीं यह सब
सह लेने की, अवश सहिष्णुता ।
मैं ।
नहीं चाहती यह संसार
।
नहीं अपेक्षित
इसका आभार ।
मुझे ठीक पता है ।
इन उच्च वर्ग की
स्नेहिल शीतल दिखती आँखों में,
कितनी जलती घोर,
वितृष्णा है ।
असह्य उपेक्षा है
।
मेरी एक निसृत
निसंग, तपः-कुटिर,
अजस्र झरित, मौन
नयन नीर ।
निर्वात निष्कंप
अंतर वर्हि, मौन ज्वलित एकाकी दीप,
भरकर अंतर में, शत
शत पीर ।
मेरे भी
पूजन गृह में देवी देवतायें हैं सुशोभित ।
वे भी
अगरु धूम से पूजित, चन्दन केशर से चर्चित ।
इन करों
के जल से होता है उनका अभिषेक ।
पूजन-आराधन
में, वे भी निरखते हैं अनिमेष ।
और मन
के आदान प्रदान संलापन,
परस्पर,
चलते हैं निर्बंध अशेष ।
दीन
कुटिर में होता है ।
अर्चावतार
।
जीवंत
मुखर होता है,
पूजन का
पुनीत भावप्रवण संसार ।
साकार ।
निराकार । एकाकार ।
संवेदन
का सम्मोहक संभार ।
किन्तु,
वे ही देव प्रतिमायें ।
जब तव
मंदिर-प्रकोष्ट में प्रविष्ट होती हैं ।
कितनी,
दूर पराई, अपरिचित हो जाती हैं ।
उनपर,
धर्म, समाज के
एकाधिकार
की मुहर पड़ जाती है ।
वे ।
नाना
प्रकार के आडम्बर व्यवधानों,
उंच नीच
की जातिगत परम्पराओं से,
जटिल,
घिर जाती हैं ।
घंटे घड़ियाल के
मतुमुल नाद में
देवता का स्वर
विलुप्त हो जाता है ।
ब्राह्मण का स्वर
बुलंद, मुखर हो जाता है ।
देवता के चरण,
स्वर्ण श्रृंखलाओं में बंध जाते हैं ।
बोल अबोल अधरों के
भीतर घुटकर, रह जाते हैं ।
मेरे प्राणों की
डोरी बंधी जहां ।
नूपुर स्वर सस्वर
हुए वहां ।
वह ।
परम सत्य ।
जीवन-तथ्य ।
ज्योतिर्मय
प्रभापुंज निकर, खिले अवदात,
विश्व कमल के
सहस्र उन्मन, उन्मन पात ।
पात-पात पर,
कम्पित कर्णिका पर,
उसका नृत्य ।
झर रहे,
खगोल-भूगोल, ब्रह्माण्ड, भुवन, उडुगन,
बन, अनगनत सीकर-कण
।
घर्षित चरण,
मर्दित क्षुभित
महाश्मशान,
उड़ रहा क्षार,
विलुप्त, सभी
संज्ञा, लक्षण, अभिज्ञान ।
जो राख उड़ी वहां,
इन चरणों को लगी
यहाँ ।
आग लगी सर्वत्र
भुवन में,
ले रही सांस
प्रकृति,
जलती लपटों की
छाया में ।
यह ।विश्व
ही, एक जलती हुई चिता है ।
रवि, शशि,नखत,
तारक गण, इसकी समिधाएँ हैं ।
समय के
विशाल कढ़ाह में,
महाकाल
का, पच रहा, अनवरत ओदन ।
चर-अचर,सबका,
कर रहा,
अविराम भक्षण ।
जो भी
यहाँ खड़े,
मात्र
अवधि रशना में हैं बंधे ।
वह,
परम
सत्य ।
हिरण्यगर्भ
परा-अपरा मर्म ।
साक्षात
ब्रह्म ।
संहार,
सृजन, लास, तांडव,
सबका
हरता-करता ।
उसके
शाश्वत एकतारे पर,
केवल,
एकाक्षर ॐ है बजता । वह,
नर्तक
है, सर्जक है ।
सर्वनियन्ता
अखंड अगोचर है ।
वह कला
चरम अभेद्य रहस्य मर्म,
सर्वश्रेष्ठ
जेष्ठ,
अजन्मा,
फिर भी श्रृष्टि
अग्रज है ।
कर्म,
एक ही हम दोनों का ।
वह,
जीवित
शव को समय-समिधा में, कर रहा भस्म ।
बनते
सब, जल, वायु, आकाश, अग्नि, अश्म ।
वह ।
अग्नि दे रहा समय को ।
मैं
अग्नि दे रही चिता को ।
दोनों ही एक वर्ण
एक जाति ।
भले ही वह
सर्वनियन्ता ।
और मैं तिरस्कृता अंत्यजा
।
यह बलात बाधित
अभिशाप
इस निकृष्ट समाज
ने ही सृजित किया ।
वह सर्वनियन्ता ।
केवल दृष्ट ।
उसने केवल एक
अच्छ्वास,
विश्व चेतना में
था, फेंका ।
किन्तु वह तटस्थ ।
जिसके कार्य इतने
स्पष्ट ।
वह ।
काल महाकाल, अकाल,
विकराल ।
निज चिरंतनता का,
उसके रूप विपर्यय
क्षणभंगुरता का,
देख रहा, अविराम,
विश्व-दर्पण में
नर्तन, विशीरण और सृजन ।
समय पियूष-सीकर
का,
कर रहा, अविछिन्न
गति से पान ।
यही ।
काल अह्वान ।
हो ।
महाश्मशान ।
अथवा प्रकृति
चित्र विचित्र चूनर परिधान,
उसके निमित्त
दोनों ही एक समान ।
उसने कभी, जाति
वैषम्य नहीं रचा ।
प्राप्त मुझे समाज
की स्वार्थपरक घृणित सजा ।
इस समाज से प्राप्त,
सदा से निर्मम
पक्षपातपूर्ण प्रतिभिस्कंदन ।
ज्वलित प्रश्नों
से हम सबका कर मुख बंद,
पड़ी अनवरत
प्रतिष्कशा स्वच्छंद ।
प्रक्षुणित
क्षुभित मर्दित दलित हम सब,
पड़े कराहते
बेसहारे धरा पर,
निठुर प्रतोद
प्रहारों से ।
ये उच्च वर्ग के
मधु आवेष्ठित गरल विष,
सुसंकृत बोल,
घोल रहे कण-कण में
जीव के असह्य तपन ।
तुम्हारे अहम भरे
विनम्र दीखते
प्रत्येक कार्य
कलाप,
केवल निज मन के ही
प्रिय अलाप ।
मुझे घोर घृणा है
तुम सबसे ।
तुमलोगों का
विषैला दर्प,
ज्यों छू गया शरीर
को अकस्मात्,
गिजगिजा गन्दा
गीला सर्प,
यह अंतर-दह
उत्पीड़क असह्य जुगुप्सा ।
तुम अब भी अपने ही
मद में ।
पता नहीं तुमको,
कितना पानी चला
गया सर के ऊपर से,
धुले न घाव, मिली
न छाँव,
अन्य के निमित्त
उसी स्थान पर
पुरस्कार, उपहार,
सादर सत्कार ।
भर-भर लाया समय का
अनवरत चलता हुआ
स्पंदन ।
किन्तु निम्न वर्ग
को वही प्राप्त
तिरस्कृत भोजन ।
निर्मम कठोर वचन ।
असह्य जीवन अभाव ।
उपेक्षा का कंटकित
तप्त सैकत वन ।
रहा सदा शोषण का
अटूट अभंग यह क्रम ।
सदैव रही समाज के
हाथों में,
नाप-तोल की तुला ।
झुकी उधर ही,
जिधर उसे, आशातीत
मनः-वांक्षित लाभ मिला ।
किन्तु, कलाकार ।
वणिक नही ।
गणित भी उसे
ग्राह्य नहीं ।
छोटी छोटी गणणाओं
में अटकता है ।
गिरता है, वह, बड़े
जोड़ तोड़ में
भला कहाँ संभलता
और, उलझता है ।
सम्मुख आप्लावित
लहराता जीवन मधु,
वह, भर भर अंजलि,
उन्मुक्त दान करता है ।
उसका, वेदना का
अपार वारापार ।
नैराश्य सजल घन,
नयन क्षितिज पर करते मनुहार ।
अश्रु वारि
वर्तिका,
अनवरत जल-जलकर,
सघन तिमिराच्छन्न
नयन द्वार को
करती रहती आलोकित
।
घन कज्जल अन्धकार
में,
कौंधती रहती,
तीसों की तड़ित ।
अवकाश कहाँ उसको ।
वह देखे ।
यह संसार ।
इस स्वर की दुनिया
का
एक बहका स्वर मुझे
मिला ।
जितनी ठेस लगी, इस
अंतर में
उतना ही यह,सरस
मुखर हुआ ।
यह एकनिष्ठ एकाग्र
साधना ।
ज्ञात नहीं
श्रद्धा के उड़ रहे, ये अगरु धूम ।
किन चरणों को कर
आवेष्ठित, उन्हें अनवरत रहे चूम ।
युग-युग का भटका,
यह प्राण पपीहा ।
सदा खोजता, निज
आवास रहा ।
थके पंख, नहीं कोई
संग ।
सांध्य-क्षितिज पर
अटका,
पीड़ित स्वर में
रहा, कूंक ।
भरकर अंतर में
असह्य हूंक ।
हो रहा
वेदना-विगली टूक-टूक ।
पल न कल,
रहा विकल,
इस भरे हुए
जन-जीवन में ।
रहा तडपता अपने
ही, कंटकित, निसंग सूनेपन में ।
क्षण, देखा उसे
श्रेष्ठी पुत्र ने,
ली गहरी सांस ।
बोला-
समीप ही वेणुवन है
।
तेरा मन अति
विषण्ण विपन्न है ।
यहीं कहीं
श्रावकों का विश्राम-बाग़ है ।
क्या ?
इन मादक नूपुरों
को त्याग,
तुम वहीँ चली
जाओगी ।
मन की इस सालती
पीड़ा द्वंदों का,
निश्चय ही समाधान
पाओगी ।
भर आँखों, क्षण
उसे देखा चन्दा ने, बोली ,
भाव विह्वल रुंधे गले,
ठेस भरे अनमने
स्वरों में-
पीड़ा ! मन की पीड़ा
!
स्थान-विशेष, उसका
निदान नहीं ।
यह, आर-पार उतरी
जिसके सीने से,
उसका तन-मन-जीवन,
जला वहीँ ।
क्यों जाऊं मैं
बेनुवन ! या बृन्दावन !
अंतरवर्हि जल रहे
अस्तित्व का कहीं
शीतल अनुलेपन
उपचार नहीं ।
अनवरत अहर्निशि
चुभ रहे कांटे से
कहीं निस्तार नहीं
।
जानती हूँ ।
ये,मनहरण,
देव विग्रह, देवालय, अवतार ।
उस
सर्वनियन्ता को पालने के उपचार ।
मात्र,
नेति नेति, निराकार साकार के
ये
स्पर्श-कातर, रंग ज्वार ।
ये
अलौकिक, अद्भुत अनूप रूप ।
निरालम्ब
आर्त विकल
शरण
खोजता, इनमे ही रहा घूम ।
सब
अवतरण ।
उसकी
मानव कल्पीय प्रतिकृति, स्वीकृति, अभिव्यक्ति ।
सभी
जानते,
“सर्व
देवाय नमस्कार, केशव प्रतिगच्छति ।”
अतः किसी अन्य धर्म, समाज, विचार से
मुझे विरोध नहीं ।
केन्द्रित हूँ
जहां,
वहाँ, कोई अवरोध
नहीं ।
इन, सामाजिक
गर्हित दुरभि संधियों का
कहीं, कोई, तर्क संगत
जवाब नहीं ।
तुम सा, देव
प्रदत्त, समाज प्रदत्त, धर्म और राज्य प्रदत्त,
हम, हत् भाग्यों का
भाग्य नहीं ।
कहाँ, देवार्चन,
पुष्प अभिषेक । आनंदातिरेक ।
कहाँ हम ।
अश्रु-आप्लावित मौन रहे देख ।
कहीं भी, बरसने
वाले शीतल श्याम जलद घन ।
जो अजस्र अमिय,
निसृत कर जाते हैं ।
वे, मेरे तक,
आते-आते
या तो बनते हैं
अंगार,
या उपल बन बरस
जाते हैं ।
जो । तेरे मन की
वंशी पर,
उतरा,मधु-रस बनकर,
वही, यहाँ छलका,
कालकूट हलाहल बनकर ।
एक ही मापदंड ।
सर्वत्र एक से,
संतुलन,
निदान, निराकरण
नहीं बनते ।
भैषज भी,
मानव प्रकृति,
मनः-भावनाओं के,
अनुरूप ही हैं
प्रभाव बदलते ।
कभी किसी समस्या
का समाधान,
एक ही,प्रश्न,
अथवा, उत्तर प्रत्युत्तर,
कदापि नहीं होते ।
प्रश्न !
सदा के रहे अधूरे
।
उत्तर- मूक अपंग ।
दिया न । अबतक,
किसी उत्तर ने,
शोषित पीड़ित,
दलितों का, संग ।
यह नूपुर ।
यह शिंजिनी झंकार
।
सहस्रार अनहत नाद,
विकसित होते,
निर्मल मानस सर में, रजत-स्नात,
ज्योतिर्मय कंज
कंवल, अवदात
अनुभूति-कम्पित,
विकच पात-पात ।
मानस क्षितिज पर,
प्रज्ञा का उदित
मुदित शुचि,
स्वस्तिमय शुभ,
आप्लावित अमिय
ज्वार संकुलित,
प्रात ।
अभंग तन्मयता,
अभेद्य तदात्मता ।
होता, तन-मन
एकाकार ।
जिनमे ये प्राण
समाहित,
अबतक वह,
अज्ञात अविदित,
फिर भी,
उस, शून्य जगत में
स्थापित,
यह शिंजिनी ।
मनः-वेणु बनी ।
जाने किसकी इसमें
फूंक पड़ी ।
यह शाश्वत स्वर ।
यह अनगुंज गूँज ।
यह थमे, या छूटे
प्राण ।
अब तो । यह विवशता
है ।
देखते नहीं नित्य,
मौन निभृत निःशब्द
नील गगन में,
जब, चर-अचर सब
थककर, सो जाते निद्रा में ।
अर्धरात्रि में,
एकाकिनी विभावरी । बनी,
बावरी, नीलाम्बर
के प्रांगण में,
सघन-नक्षत-नूपुरों
की शिंजिनी पहन,
करती है नृत्य ।
पग, अविराम
निरंतर,
प्रकृति स्वर
तालों पर चलते-चलते,
हो जाते हैं रक्त
रंजित,क्षत-विक्षत,
टूट-टूट, गिरते, मौक्तिक
से नखत ।
किन्तु ।
नृत्य नहीं थमता है
।
काली चादर से मुख
ढंककर,
किंचित उससे हटाकर
निर्यक होकर,
अपलक सजल
अश्रुपूरित आँखों से,
चाँद उसे निरखता
है ।
ढल ढल आंसू गिरता
है ।
खड़ा मौन धनञ्जय,
बोला अस्फुट स्वर
मे –
तुम ।
जो भी कह लो ।
कहा नहीं प्रभु ने
।
यह मात्र
आत्म-अभिव्यंजना है ।
स्वतः को,
प्रत्युत्तरित
प्रतिबिंबित कर लेने की,
यह,मनमोहक छलना है
।
केवल, आत्म वंचना
है ।
बलात आकृष्ट होकर
दीपंकर सरिस
लालसा लपटों में
जलना है ।
बोली गंभीर मुद्रा
में चन्दा-
भाव-वैषम्य, विचार
निकष-परख ।
विभिन्न
दृष्टिकोणों के, होते हैं आत्म-दर्पण ।
जो, जिस रूप में,
जहां हुआ समर्पण ।
प्रव्रज्या,
स्पृहा-रहित है ।
इस एकांत एकाग्रता
में भी,
सब द्वार बंद ।
प्रवेश, निषिद्ध
है ।
एकात्मता,
कब ऐश्णायों से
होती बिद्ध ।
एक लक्ष्य ।
एक भाव ही अभीष्ट
।
किया जिन्होंने,
सत्य-स्पर्श ।
विचार रहे उनके,
सदा निष्पक्ष ।
किन्तु ।
वह ।
विराट ।
वह सर्वनियंता ।
कितनी ज्वलंत
मुखर, उसकी, आत्मभिव्यंजना ।
रवि शशि, ये समस्त
भुवन ।
प्रगट अप्रगट,
खगोल लोक ।
रहा मौन नत् उसे
विलोक ।
जड़, चेतन सबमे
निवास ।
संहार, सृजन,
विलयन, मादक लास ।
गिरि, गह्वर,
विजन, उपवन ।
सागर-उद्वेलन ।
हिमगिरि किरीट,
सत् सहस्र्रंग ।
सबमे ।
आलिप्त,
निर्लिप्त, निहित, निष्कृत,
क्या, यह, नहीं
उसका अहम् ।
विकीर्णित सबमे
भर,
अपना, नैसर्गिक
भाव-तरंग ।
क्यों नहीं,
ऐश्नाओं की
सहस्र-फण-प्रच्छायित
शय्या में
अपने ही उत्ताल
तरंगित विचार-उदधि के,
दुग्ध-धवल-जलधि
में,
रहा सदा ही,
सुशुप्त शयित ।
क्यों ?
दर्पण, उसकी बनी,
समग्र सृष्टि ।
क्यों ?
किसके निमित्त,
यह, आत्म-ज्ञापन ।
स्पृहायें रहें या
नहीं रहें ।
करता, सबमे वह अयन
।
घूम कर बोली-
श्रेष्ठी पुत्र ।
धन्यवाद ।
तुमने व्यर्थ ही
किया,
यह प्रलाप सहन ।
अच्छा हो ।
मुझे तनिक दे दो
एकांत ।
क्षण उसे निरख,
बोला वह –
मात्र अपेक्षित एक
प्रश्न का उत्तर ।
लौटूंगा मैं सुनकर
सत्वर ।
यह कला ! यह रूप !
क्या निरुत्तर ही
रह जाएगा ।
दोनों ही,
जन-मानस-अनुमोदन-कान्क्षित हैं ।
आँख उठाकर चन्दा
ने देखा ।
किंचित आयी स्मित
रेखा ।
बोली- औरों की
नहीं, मैं अपनी कहती हूँ ।
यह तन-मन-जीवन ।
प्राण-यज्ञ-हवन ।
मैं उसका
हविष्यन्न, अगरू, धूम, चन्दन ।
पुलकित विकसित
सुरभित हृद-नंदन-वन ।
छूकर उसकी, एक
मृदुल छुवन ।
सीमित-सत्य-संध
सौदर्य ।
अनंत
कमनीय-समर्पित होता है ।
नूपुर स्वतः
रसः-पूरित ।
लावण्य उत्तरोत्तर
उर्जस्वित होता है
इन्हें क्षणभंगुरता
नहीं ।
यह चिरंतनता का
कांक्षी होता है ।
अतः श्रेष्ठीपुत्र
।
इन नूपुरों में
संसृति-हृद-धड़कन ।
निस्वन ।
रूप !
इसपर अनन्त-सुधा-मधु
वर्षण ।
दोनों उसकी छाया
में ।
कालजयी यह कमनीयता
।
समय-दाह, न जला
पायेगा ।
अक्षुण्ण ये नूपुर
इनमें शाश्वत स्वर
भरता जाएगा ।
स्मरण रखना ।
दोनों, उसके
माध्यम ।
स्वयं में दोनों
ही नितांत अक्षम ।
जैसे ही मौन हुई
चन्दा,
लौट पडा धनञ्जय ।
सूना था, विजन
प्रांत ।
मन था, पीड़ित
श्रांत विभ्रांत ।
जीवन-विटप पर,
बैठा,
पथ-श्रांत प्राणों
का पंक्षी,
एक-एक तृण,
चंचु से नोच-नोच
कर देख रहा था ।
कितने तीखे कांटे
चुभे निहित,
इस जीवन-चषक परिधि
में ।
ढल-ढल बह रहे थे
अश्रु,
देखा,
अश्रु-आप्लावित आँखों से, चारो ओर ।
लेकर गहरी सांस,
बोली मन ही मन ।
आह ! पड़ी कैसी
ठोकर ।
गिरी भूमि पर
निराधार, औंधी होकर ।
यह उन्नत
दर्पपूर्ण प्रतिस्पर्धित भाल ।
लगा इसपर एक काला
टीका ।
सदियों के,
कटु व्यंगपूर्ण
विषाक्त हास के संग आया,
माथे पर,
ज्वलित अंगार सा,
लग मुस्काया ।
यह ।
मैं थी ।
यही मिला था उपहार
।
केवल ।
विवश मौन रहने के,
मेरे समीप, संबल
ही क्या था ।
चिर दिन के साथी,
ध्वस्त अभिलाषायें,
बहते आंसू ।
ये नयन नीर ।
भर असह्य पीर ।
जब भी आहत निकले,
निसंग बहे ।
मिले, पथ पर
स्मृतियों के कितने भी पड़ाव ।
वे, निरावृत्त,
निसंग, तपे, जले,मिले ।
कभी न रही उनपर,
कोई
पल्लव-प्रच्छायित,
शीतल श्यामल छाँव ।
इस प्यासी बंजर
धरती पर आ पड़ी,
कहाँ से
क्षुद्र-घंटिका ।
नितांत दुखिता ।
पीर भरी थी, इन
झंकारों में ।
लय-सुर-तालों के,
तानों-बानों में,
मैंने भी अपने
आंसू से,
इसमें मनमाने रंग
भरे ।
जाने कितने जन्मों
के तंद्रालस,
कहीं पड़े,
प्राण-वेणु में
टीसों के नए नए आलाप उठे ।
तन, रहा यहीं पड़ा
।
मन, समस्त भुवन,
भ्रमण कर आया ।
देखा ।
अश्म बने पड़े अनगनत
टुकड़ों में,
प्रलय-प्रताड़ित,
भुवन-खंड । बिखरे केशों में,
जीर्ण शीर्ण वसनों
में,
दोनों कर से मुख
ढँक कर रो रही थी,
उसांसें भारती दीन
सी, प्रकृति,
जाने कैसा,
क्यों, उसको मिला,
किससे, यह दंड ।
देखा ।
प्रलायांकित
क्षत-विक्षत पड़े, अवशेषों को ।
अब भी दहले हुए
मौन, सिसकते से हैं ।
किसी, अन्य
अप्रत्याशित से आतंकित,
भयभीत चकित व्यथित
से हैं ।
भारी चरणों को
रखता,
समय,कुचल गया ।
उसके पद-चिन्हों
को निरख-निरख,
है भयभीत सशंकित ।
तांडव कर गया शंकर
।
काँप रही प्रकृति
थर-थर,
छिड़ा, विश्व-वीणा
में,
पीड़ा का, झंकृत
करता मारक मार्मिक स्वर ।
चेतना, सुषुप्त
आहत,
ले रही हौले-हौले
करवट ।
धीरे-धीरे, उठकर,
अश्रुभरी आँखों से
देखा सर्वत्र,
सब कितने टूटे
बिखरे हैं ।
किस तरह व्यथा में
तड़प रहे हैं ।
हर टुकड़ों को
उठा-उठा कर,
ममता के हाथों से
सहला कर,
पुनः उन्हें,
जोड़-जोड़ कर,
सर्वांग बना लेने
की, चिंता में है,
सतत निरत ।टूटा,
कभी पुनः नहीं
जुटता ।
उसका पुनर्निर्माण
सदा होता है ।
पर मन ।
कब ।
ममता का यह विछोह,
सह सकता है ।
जो बीत गया, उसे
पा लेने की,
यह कैसी अवश कातर
पीड़ा है ।
व्यथा की निसृत
निसंग विरल घाटियों में,
घूम रहा मन,
थकित विपन्न
विषण्ण ।
जाऊं कहाँ ।
कहूं किससे ।
इस व्यथा
विक्षिप्त, मन ने,
अब तक कितना क्या
क्या झेला है ।
आश्वासन के,
आमंत्रण देते, समस्त प्रतीक ।
दीखते
नितांत,व्यलीक ।
क्या मिलेगा ।
कहीं भी जाकर ।
वह ।
पूजन-प्रतीक हो,
या तपः-भूमि हो ।
सागर की
महोर्मियाँ हो,
या सरिता की मृदुल
वीचियाँ हो ।
मन में, बस एक ही,
अनगूंज गूँज ।
जहां हो गयी समस्त
संवेदना, अचल ।
नहीं कर सकती, कोई
रंग लहरियां अब चंचल ।
बंधी, जिससे यह
स्वांसों की डोरी ।
जिसने दी, यह उजली
चादर कोरी ।
उन्हीं, पावन पदतल
के नीचे,
पावड़ों सा बिछ
जाना है,
गोपी-चन्दन सा लग
जाना है ।
तर्क कुंठित,
श्रद्धा सस्मित,
अमृत, लहराता
आप्लावित ।
समस्त, रूप अरूप
कारण-भूत,
संज्ञाएँ, मात्र,
उसी सत्य की है ।
वह ।
है, संहार-सृजन,
विविध रूप में, कर्ता,
हर्ता,निर्माता,
सर्वत्र व्याप्त,
फिर भी, अज्ञात,
वह ।
यह, संघातिक
मर्मान्तक चोट ।
सका, न कोई, अवरोध
रोक ।
अप्रतिहत गति ।
सबमे निहित ।
वेदना ।
वेदना की ।
व्याकुल आर्त,
कराह है ।
पर, पीड़ा को देखा
किसने ।
प्रत्यक्ष मात्र,
प्रतिक्रया ।
वही है ।
वह ।
सर्वनियन्ता ।
वह ।मेरा ।
एकांत,
पल्लव-प्रच्छायित-सघन-शीतल,
स्नेहिल निवास ।
जला, उन्ही चरणों
में यह निश्कल्मष आत्म-प्रकाश ।
मेरा जन्म-जन्म
का, अडिग, दृढ़, विश्वास ।
मैं ।
उसकी छाया में
निर्भय ।
वह ।
अप्रत्यक्ष ही
रहा, कितने रूपों में,
किन्तु रहा, परम
सदय ।
आज भी, जो चोट
मिली ।
नव-ज्ञानोन्मेष का
उज्जवल प्रभात मिला ।
प्रेरणा, उषा सी,
मनः प्रांगण में उतरी ।
मैं ।
पीड़ित अंत्यजा ।
स्वास-स्वांस से,
उसे समर्पित ।
मनःकालिंदी में वह
वंशी धुन गूँज उठी ।
मैं कर्षित,
मन्त्र-मुग्ध, रही थिरक,
मेरी
क्षुद्रघंटिका खनक उठी ।
अनुभूति अमिय कलश
में डूबी,
यह शिंजिनी, इसे,
कालकूट हलाहल का
लहराता पारावार मिला ।
यह, लहर लहर पर
नाच उठी ।
शरत-चन्द्र-चषक,
में भर गरल,
कर, आकंठ पान,
यह मत्त मयूरी सी
नर्तित,
भावों के सजल
श्यामल नील नीरद में,
अपांज्योति सी झूम
उठी ।
यह सम्पूर्ण भुवन
।
मुझ रंगिणि का
उसमें नर्तन ।
कला ।
केवल कला ।
इसके पावन पुनीत
चरणों में,
आमरण आजन्म, यह
जला ।
जीवन झुका ।
ह्रदय ।
आमूल अंतरवर्हि
विदग्ध वेदना विष बुझा ।
नितांत निसंग,
मैं निर्भीक
निश्छल ।
जन्म जन्मान्तर का
यह प्राण तृषित
विकल ।
केवल सत्य-संधान
लक्ष्य अतल ।
अनुभूति-अपांज्योति,
मनः-नीरद पटल ।
तपः-यजन ।ज्वलित
आत्म ज्योति निष्कल ।
उस ।
महत परम प्रसादमय
अवकाश तले ।
यह, निसंग निभृत
लघु दीपिका जली ।
उस महार्णव में
घुलती मैं क्षुद्र डली ।
नितांत अजस्र
अनुभूति तुहिनाश्रु पली ।

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