ज्ञात हुआ.
ममतामयी प्रजापति
को,
कजंगल के घोर
विजन-वन में,
उशीर, खस, वेणुवन,
अंगारक के,
गहन संकुलित कानन
में,
निसंग एकाकी
समाधिस्थ है.
उसका, अति कोमल कँवल
सरिस सुकुमार,
सिद्धार्थ राजकुमार.
वात्सल्य स्नेह का
वेग, प्रबल था,
रात्रि दिवस, पल न
कल था.
जीवन. पाल रहित नौका
सा, कहर-प्रताडित,
झंझा-झकोर-मर्दित,
दिशा-विहीन-विभ्रमित,
पीड़ा-कातर, त्रस्त,
विचल था.
एक लक्ष्य. एक
ध्यान.
किस प्रकार प्राप्त
हो.
जीवन धन.
प्राण.
वह. कपिलवस्तु से
निकल.
मन ही मन अति विकल,
विषादपूर्ण, विषण्ण,
पथ श्रम
क्लान्त
पठार प्रदेश
पार कर, आई, दक्षिण
पूर्व.
अंग प्रदेश की नील
पहाड़ियों के मध्य. थे वहाँ,
अर्जुन, वकुल, पाकड़,
वट, चलदल, रसाल,
खिदिर वन के, श्यामल
सघन वन.
बह रही थी,
बहुल
पकड़ी अनाम नदिया, कुल्यायें,
थे विरल
पर्वत अलंघ्य.
देखा.
वेणु,
समूहों से आवृत,
खिदिर
के श्यामल हरित सघन वृक्षों से,
संकुलित,
गहन निकुंज में,
था,
समाधिस्थ वह परम ज्योतिर्मय पुंज.
क्या
झरेंगे, झरने,
क्या
बरसेंगे, सजल जलद घने.
आँखों
में उमड़ा लहराता, ज्वार संकुलित, अश्रु पारावार.
कर उठा,
कातर ह्रदय हाहाकार.
काँप
रही थी आंधी के पातों सी,
रहा न
किंचित तन मन का सम्भार.
यह वही.
कल्पनाओं
का.
स्वप्नों
का राजकुमार.
घिरा,
कंटकित कराल वन में.
जो सोता
था, ह्रदय धडकनों पर, सुकुमार.
थपकी
देकर नहीं, अपितु, चुम्बनों के थाप दे दे कर,
जिसे,
वह सहज स्नेह से सुलाती थी.
निज
आँखों के दर्पण में, उसे.
उसकी
हास्य मुदित कौतुक भरी, छवि, दिखलाती थी.
यह. वही.उसके
प्राणों की पीड़ा.
आह !
नियति की निर्मम क्रीड़ा
जो धरा
पर नहीं
उसके
धड़कते ह्रदय शतदल पर चलता था.
जिसे
निरख, होता था, मन, मन्त्र-मुग्ध, विभोर
सम्मोहन
का इंद्रजाल सस्मित खिंच आता था.
अन्तर
आकुल स्नेह मर्माहत,
पुलक
पुलक उच्छ्वासित कहता था.
तू मेरा
सुत, मैं तेरी माता.
समस्त
भुवन क्रीड़ा-कौतुक,
अकिंचन
अति लघु.
जाने
आँचल में कहाँ समा जाता था.
निरख
उसे.
निश्चेष्ट
एकाग्र निसंग.
हुई,
प्रजापति की विसुध चेतना
टूक-टूक,
एक संग भंग.
आह .
कैसा यह अप्रतिम अदभुत.
माँ थी.
रोक न पायी अन्तर.
कर उठी
रुदन कातर.
सिद्धार्थ
! मेरे प्राणोपम !
चल उठ,
चल. घर चल.
अब कर न
रंचक विलम्ब. !
जब से
तू आया है,
जिन
वीथी अनुरथ्या से निकला है.
गौवें
उस ओर.
पथ हेर,
आर्त रंभाती हैं.
पग,
ध्वनि सुनते ही, अश्वशाला में अश्व, घोष मचाते हैं.
उस दिन
के अभाव को, पूर्ण कर लेने के मिस विकल
क्षोभ दिखाते है.
जब
संध्या घिरती है. श्यामलता तरु शिखाओं पर, उतरती है.
कोई भी
अश्वरोही, यदि गृह से कार्यवश भी बाहर, जाता है.
पुरवासियों
की भयाकुल, कई सशंकित प्रश्न भरी आँखें उठती हैं.
कहीं यह
भी तो, गृह त्याग-
बिना
कुछ कहे सुने, कुमार सरिस ही तो नहीं, चला गया.
कहीं
किसी शस्य श्यामल, कृषी को,
सहसा
अप्रत्याशित, वज्रपात तो, नहीं जला गया.
उसी
प्रकार सब वृक्ष गुल्म खड़े.
वन उपवन
चित्र लिखित से हैं.
जो
आतंकित कर, बीत गया, प्रबल प्रभंजन सा,
उससे आहत, संज्ञाशून्य जड़ बने. उनकी हिलती
टहनियाँ,
जैसे,
स्मृति-झोंके खाती, हाथ हिलाती,
आकुल सी
व्यथित बुलाती हैं.
वही
पुष्करणी है.
वही
बावली है.
वैसे ही
खिले चित्र विचित्र शतदल.
पर नहीं
चंचल लोलित, तड़ाग का वीचि भरा जल.
नहीं.
रस रंग सुरभि से कम्पित उन्मन.
खिले
कंज के, कोमल अंग-अंग.
नहीं,
मदिर अलस पात-पात.
नहीं,
आमंत्रण देता जलजात.
जड़ हो गया
मदिरालास पवन उन्मन.
अवधि
रशना से बंधे, वहाँ कर रहे,
यंत्र-चालित
से सब जीवन स्वांस.
उसी जल
में संतरित क्रीडा करते, मराल.
पंख
नहीं फड़फड़ाते हैं.
पलकें
उनकी बंद.
वक्ष में
चंचु दबाकर, चिंतामग्न, निराधार बहे जाते हैं.
अब भी,
यदि पथ भूल कहीं भटक कर कभी भी,
आता है
अनियंत्रित बसंत.
उपवनों
के द्वार खटखटाता, उपेक्षित निराश लौट जाता है.
तरू
वृन्तों पाटों से, मुख निकाल, हंस कर,
कोई भी
पुष्प, उसे सादर नहीं बुलाता है.
मंजरियों
के भार से दब जाते हैं पादप रसाल.
उनकी
डालों में बैठ बैठ.
कोकल,
गुंजित नहीं करती उनका, शून्य अंतराल. अपितु,
सुगंध
सौरभ से व्याकुल. ह्रदय विदारक चीख मचाती है.
किसके
निमित्त, आप्लावित, बासंती, रसः-प्याली
क्यों
झुकी पलाश अशोक-पुष्प से भर लदी डाली ?
क्यों
प्राची और प्रतीची का आँचल आँसू से भींगा है ?
दीपाघरों
में दीप जले, निष्प्रभ विवर्ण दीप.
निशा-यात्रा
का मात्र अवधि-दण्ड भरते हैं.
प्राचीरों
के उल्लसित मुदित, स्फटिक संगमरमरी, स्तंभ.
प्रश्न
चिन्ह बने, मौन खड़े से हैं.
जैसे,
उनको भी कोई उत्तर, अहर्निशी सदा, अपेक्षित है.
पत्रः
निरख रहे.
खुले
गवाक्ष.
खुले
वातायन.
प्रतीक्षाकुल,
अधीर,प्यासे हैं.
बंद
कपाटों के भीतर,
गहन
उदासी की श्यामलता, ठंडी साँसें,भरती हैं.
किसी
गृह में,
नवीन
जन्म सुत का
संग ही
प्रश्नों को लेकर आता है.
एक साथ
सभी के ह्रदय,
सशंकित,
मौन प्रश्न यह करते हैं.
वयस
प्राप्त कर यह गृह में रह जाएगा,
या बिना
सूचना दिए, अर्हत बन जाएगा.
क्वारी
बालाओं की पाणिग्रहण में,
ज्योतिर्विद
से,गण, नहीं मिलाए जाते हैं.
अपितु विकल
पिता के संत्रस्त प्रश्न यही बार-बार होते हैं.
यह
पाणि-पीड़न, रहेंगे आजीवन.
कहीं,अप्रत्याशित
विछोह का तो, नहीं झेलेंगे उत्पीड़न.
किसी
नवविवाहिता का स्वामी,
अचानक
कक्ष से, बाहर आता है.
घबडा कर
युवती,
जल भरे
व्यथा विकल नयनों से, देखती नील गगन.
कहीं,
उत्तराषाढ़ नक्षत्र युक्त,
आज,
आषाढ़ की धुली दुग्ध धवल खिली, पूर्णिमा तो नहीं.
कहीं,
किसी नक्षत्र की वक्र कुदृष्टि.
उसके
सौभाग्य सुमन पर, पड़ी तो नहीं.
चाँदनी
का लहराता उज्जवल पटल.
सौख्य
मुदित कुसुमित कानन पर,
ओलों को
बरसाता,
विकच
अरमानों पर कफ़न डालता सा लगता है.
निज
स्वामी का पथ रोक, विकल कातर,
वे
अश्रुभरी अनुनय करती है,
मत जाओ
प्रियतम.
आज भी,
अशुभ्र पूर्णिमा खिली.
इस
अकिंचन फैले आँचल में,
कहीं
ज्वलित उल्काएँ गिरकर,
अभिशापों
की तो, नहीं जली,
कोई भी
तिथि, पुरवासियों के पूजन निमित्त,
शुभ
सूचक नहीं रही.
एक साथ
सबकी प्रश्न भरी आँखें, उठती हैं.
कहीं आज
आषाढ़ पूर्णिमा तो नहीं.
सबके मन
में एक ही व्यापक भय है.
किस
प्रकार जीवन यापन हो,
घर
सुविन्यस्त पूर्वत सा ही चलता रहे.
नहीं,
पिता या माता, पुत्र वियोग सहे.
नहीं,
कोई नवजात शिशु.
माता के
क्रोड़ में पितृ स्नेह वंचित,
अश्रु-प्रच्छायित
आँखों तले पले.
नहीं,
किसी नववय युवती का अंतर,
मौन
मर्मान्तक रोदन से, अहर्निशी भरे.
नहीं,उसके
आँचल के भीतर.
प्रतीक्षाकुल
विरह-दीप,
मौन
निसंग अनवरत जले.
मात्र
तेरा विछोह.
कर गया,
कपिलवस्तु को दारुण व्यथा संदोह.
मूक
खड़ी, प्रासाद की प्राचीरें भी,
अब
उल्लसित सी नहीं चहकती हैं.
नियति
पटल बनी, गहरी साँसों से,
विरह-अवधि,
अनूभूति, अश्रुओं से लिखती हैं.
वे. वीथियाँ.
वे भी,
दिन में,
दिवस ताप से भरती,
रात्रि
में, नखत-कंटक से बिंध, विकल तडपती हैं.
जिन पर
तव पद चिन्ह अंकित थे,
जिनके
अन्तर स्नेह-स्पर्श से, कम्पित गर्वित थे.
उन्हें.
अभी भी
आशा है, कुमार कक्ष-कपाट,
पट
उन्मुक्त कर हौले-हौले आयेंगे.
उनके, कल
कोमल कंज पद-स्पर्श,
शीतल
अनुलेपन जायेंगे.
अब, वपनोत्सव
भी नहीं होते हैं.
वरद
मौन, कृषक दीन. केवल,
यंत्रवत
भार वहाँ करते हैं.
नहीं
सजती, वन वीथियाँ.
नहीं
खेतों में उठता, गुलाल, नव रंग भर उमंग.
नहीं
सहस्र वरदों की जोड़ी, एक संग चलती है.
कोई
नहीं किसी से,कुछ भी कहते हैं.
पर एक
दूसरे के अन्तर को, मौन स्पष्ट सब पढते हैं.
एक चोट.
कितना सामीप्य दे गयी.
शब्दों
की नहीं मुखरता है.
आँखें,
यथेष्ठ है भाव व्यक्त कर लेने को,
मन में
जो कुछ भी रहता है.
ऐसा होता
है भास, एक प्राण के, ये सब हैं, अगणित आवास.
शान्त
मौन से ये दीखते हैं,
पर भीतर
ही भीतर हैं, कितने पीड़ित अधीर.
एक किसी
के, भरे नयन, दूसरे के उत्तर, होते हैं.
भर कर
पीर
पृथक
गृहों में रह कर भी,
सब, एक
यंत्रणा से हैं पीड़ित.
नियति-इंद्रजाल-आबद्ध,
विवश,
सब हैं,
शीश झुकाए विजड़ित.
रात्रि.
विषण्ण गहन, पीर भरी घनी उदासी लेकर,
प्रासादों
पर झुक आती है.
अपने
क्षत-विक्षत, जल भरे, जलते नखत-छालों से व्याकुल,
हर करवट
में आंहें भरती है.
अब. कहाँ
प्रात. कहाँ रात.
कहाँ
विभावरी. कहाँ चांदनी.
मन के
एकाकी बंजर सैकत वन में,
केश
नोचती पगली सी विक्षिप्त,
घूम रही
अहर्निशी पीड़ा दीवानी.
समय कर
गया सबको आत्मसात.
केवल
कांटे सी खटक रही,
सबके मन
में एक ही बात.
जो बिना
कहे चुपचाप चला गया.
वह. कब
लौटेगा.
अमराई
में, गहन निशा में,
व्यथा
विदग्ध, कोकिल चीख-चीख कर रही चिंदी-चिंदी, रात.
और
पीड़ित ह्रदय, कराहता, कब होगा प्रात.
किन्तु
दिवस भी, अति विवश.
अरमानों
के आरक्त रक्त से छलकता,
भर कर
लाता है.
नित्य
लोहित चषक.
समस्त
दिन, भर जाता है मर्मान्तक विष अथक.
वेदना के अनगनत
सूइयों से, अनवरत चुभा,
वह.
व्यथा विदग्ध
अश्रुपूरित नयनों से, झुका, देखता रहता,
कातर अंतर, पतझारों
का कांतर सैकत वन.
कहाँ चला गया, वह.
अभिनव संजीवन.
हरित पल्लवित
पुष्पित सुरभित उपवन.
फूल नहीं, अब शूल भरे पथ.
निरख रहे, अनन्त में विलीन होता,
दुर्गम दारुण जीवन
असह्य अकथ.
सूनी है नृत्य शालाएं, रंग शालाएं.
नहीं बजते वीणा वेणु
या मृदंग.
नहीं होता अब कोई
रास रंग.
नुपूर कहीं पड़े.
क्षुद्र घंटिकायों
पर नियति निर्मम प्रहार पड़े.
एक उदासी का, बहता
शीत पवन.
विसुध क्षतों को, दे
जाता, पीड़ित सिहरन.
हर सोये घाव, जग
उठते, तड़प कर,
लेकर अपने, नहीं
भरने वाले पीड़ित अभाव.
वे. सुसज्जित नव
पल्लवित, मादक मनमोहक नववयांगनाएँ.
विषादमयी अनुचरी बनी
सी, जोड़ रही,
टूटी स्मृतियों की
भग्न सृकाएं.
एक एक मनके, आँसू
भींगे, बीते अतीत को कहते है.
वे अश्रु-पटल आवृत,
चित्र पटल बने रहते हैं.
और. वहाँ.
एक, अनुत्तरित पीड़ित
प्रश्न.
गिर रहा बनकर,
ज्वलित अश्म,
साक्षात पीड़ा.
नियति क्रीड़ा.
केवल, अपराधी-स्वांसों
की दण्ड-भरी-माला.
क्यों अदृष्ट अहिने,
उसके,
अमिय आप्लावित छलकते
प्याले को
निरर्थक, विष दंशित
कर डाला.
गृह की, स्वांसें
खिंच आती हैं.
जब, वह, हटात्
सम्मुख पड़ जाती है.
खिला कंज अवदात.
हो गया, अचानक वज्र
निपात्.
विगलित, भींगे,
निष्प्रभ पात-पात.
वह.
देवदह की राजकुमारी.
नियति-शल्य बिंधी,
निराधार विवश हारी.
यशोधरा !.
समय-अवधि को भी,
संज्ञा शून्य हिमवत करता,
विरह, उसका, अचल
अडिग मौन खड़ा.
विवर्ण शुष्क कंपते,
आरक्त अधर.
शब्द, अधरों के भीतर
ही आकुल.
बाहर आने के प्रयास
से,
छिन्न-भिन्न होकर
निज स्वरूप भूल गए.
स्वर विकल. आकार
खोजते,
अवकाश में निराधार
झूल रहे.
अधर कसे. व्यथा सहे.
हो गए पत्थर. अश्रु
झर.
स्वप्न राका-स्नात,
आँखों में ही हो गए, अश्म-इतिहास.
जब भी, घुटने के बल चलते,
राहुल पर,
उसकी सूनी दृष्टि
पड़ी.
जलते मरूथल पर,
सहस्र विद्युत प्रभा,
एक संग टूट पड़ी.
और विद्रूप
अट्टहासों से आतंकित करता, धूमकेतु सा,
भाग्य-पटल पर विलीन
हुआ, समय.
सब झेलता.
हत् भाग्य !
नितांत विवश, दीन हुआ.
एक दिवस, दोनों
छोटे-छोटे हाथों को झारता,
गोपा के घुटनों को
पकड़, राहुल खड़ा हुआ.
भोली निश्चल आँखों
से, रहा देखता,
निज माता को अपलक.
बाल सुलभ उसके भरे,
आरक्त अधर.
आकुंचित हो रहे थे,
होने को मुखर,
और तोतली वाणी में,
रहे खोजते,
अभिव्यंजना के शब्द
सुघर.
चौंकी गोपा.
वह क्या प्रश्न करेगा.
उसकी,कहीं दूर, जड़ी
सूनी आँखें, हो उठी,
सशंकित अश्रु
आप्लावित कातर.
मौन ही, शीश हिलाकर
किया उसने निषेध.
वत्स ! अभी समय
नहीं.
मत तू ! कोई भी
प्रश्न कर.
किन्तु समय जड़ नहीं.
वह निरंतर अनवरत है गतिशील.
एक दिवस. वह शून्य
घड़ी आ ही पंहुची.
बालक.
घुटनों तक नहीं, बैठी,
गोपा की, आँखों तक आ पहुँचा.
उसकी आँखों की नीली
झीलों में,
प्रश्नों का था
सहस्र जलजात खिला.
स्वर.
व्यंजन स्वरूपों से
ही, नहीं थे सक्षम.
उन्हें भावों का रस,
उतार-चढ़ाव मिला.
दुग्ध धुले कच्चे
दूधों की महक में, धुली,
बाल-सुलभ आकुल अन्तर
की भी,
पीड़ित हल्की झंकार
मिली.
आज ! स्वर के घनत्व
में, ममत्व भी अकुलाता था.
आता हुआ, प्रश्न,
ह्रदय में, दूर कहीं लड़खड़ाता था.
फिर भी आँखों में,
एक हटीली दृढ़ता.
अधरों पर, संकल्पों
की प्रांजल प्रखर प्रभा.
घबड़ाई गोपा.
जीवन-पक्षी.
क्या एक पक्ष से
उड़ता है.
विशाल अनन्त आकाश.
वह. क्या एकाकी
वहाँ, बसेरा करता है.
नीड़ में भी दोनों
दम्पति, छौनों को दाना देते हैं.
एक यदि उड़ा तो,
दूसरा, रक्षा निमित्त सदा रहता है.
गोपा की, आँखों में
आँखें डाल,
बोला, राहुल.
माँ ! तात कहाँ रहते
हैं ?
वे साथ नहीं, हम
सबके.
उनका कक्ष कहाँ है ?
प्रश्नाह्त,
गोपा की आँखों का जल
प्लावन,
तोड़ गया सभी थमा
बंधन.
पुनः बोला वह.
तू मेरी जननी.
मेरा जनक कहाँ है ?
क्षण, निर्निमेष
निरुत्तर रही देखती, गोपा कातर,
दोनों बाहों में कर
राहुल को आबद्ध,
हो उठी उद्वेलित,
उसका उच्छ्वसित अन्तर.
मन ही मन बोली.
यह जीवन पक्षी.
दोनों पक्ष निज,
मुदित फैला कर रहा उड़ता, कुलांचें भरता.
नील गगन में,मस्त
पवन में,
एक ही पक्ष रहा,
उसके तन में,
दूसरा कट कर गिरा
कहीं सुदूर कंटक वन में,
उसका अबतक पता नहीं.
गिरा, धरा पर लोहित
आहत मुर्मूष,
तडपता रहेगा, जाने
कब तक.
फिर बोली सुत की ओर
सजल उन्मुख होकर.
सुत !
आकुल बोला पुनः
राहुल-
क्यों नहीं दिखाई
देते, उनका वह आवास कहाँ है ?
वह भी तेरी भांति ही
कोमल स्नेहिल,
या, कुछ और बने हैं.
सब बालक मेरे साथी,
पिता के संग रहते हैं.
माता उनकों स्नेह
जताती.
किन्तु, यह आधा
प्यार ही क्यों मुझे मिला हैं.
पूछा,
जिन लोगों से, सब
निज सहजता त्याग, कठिन हो जाते हैं.
पल मुझे देखते, ठंडी
साँसें लेकर, आगे बढ़ जाते हैं.
तू ही कह !
तात ! कहाँ हैं ?
क्या कहीं अन्यत्र
रहते हैं.
मुझे तेरी छाया में
डाल, वे परम निश्चिन्त बने हैं.
उस दिन.
धमनियों में चलता
रक्त, गोपा का,
जड़ हो आया.
अधर अर्ध खुले, आधे
बंद.
आँखों में जल.
छलक-छलक , आया.
कठिन हुई चेष्टाएं.
भौवों पर, पीड़ा का बल
पड़ आया.
तत्काल उठी, खड़ी
हुई, किन्तु शीश घूर्णित हो आया.
कांपते कर से, दीवाल
पकड़, घूम कर देखा, उसने,
राहुल को, बोली-
वत्स ! न प्रश्न कर.
अन्य तुझे बहला लेंगे. जो सो, कुछ कह लेंगे.
माता हूँ मैं.
अन्यथा नहीं कहूँगी.
सत्य,असत्य में, बड़ी
दूरी है.
किन्तु कब असत्य
चिपक जाता है, सत्य से,
यह समय, परिस्थतियों
की, बड़ी विषम,मजबूरी है.
किन्तु ! मैं !
तुझसे, कदापि असत्य
नहीं कहूँगी.
जाने तू भी, कब तक
देगा साथ.
या मैं. इसी प्रकार
नितांत, एकाकिनी ही,
सदा रहूंगी इसी
प्रकार अनाथ.
कह, मेरी आँखों के
दर्पण में
तू तो सदा बना
रहेगा.
वात्सल्य स्नेह का
दीप, अन्तर में,
निश्चल निर्वात जला
रहेगा.
बस इतना ही, तू कह
दे.
कुछ भयातुर सा
राहुल, गोपा की ऊँगली पकड़ बोला- माँ !
बोली गोपा- राहुल !
छोटी-छोटी चोटों को
गहरी बड़ी चोट पी जाती है.
पीड़ा की अनगनत
रेखाओं सी,
पर्वत ह्रदय विदीर्ण
कर व्याकुल सरिताएं,
शान्ति खोजती, अंततः
गिरती है, सागर में,
विलीन हो जाती है.
एक, जब अनेक में मिलता
है.
उसमें ही खो जाता
है.
फिर समष्टि नहीं
व्यष्टि ही,
उसका स्वरूप हो जाता
है.
अपनी पीड़ा नहीं,
विश्व पीड़ा,
उसका ह्रदय अपनाता
है.
विश्व नहीं,
वही विश्व का दर्शन
बन जाता है.
तेरे तात ! नहीं कभी
देखा था उनके कोमल मन ने.
आयु पर पड़ते ज़रा,
मरण, व्याधि के,
निर्मम आघात,
हृदयहीन उत्पात.
तन-मन-प्राण, विचार
संकुलित,
जटिल,मृणाल तंतुओं
में, वह, कोमल जलजात.
सहसा, सत्य-गवेषणा
संधान संकल्प,
कठिन हो आया.
गए, यह गृह त्याग.
बाल सुलभ कोमल मुख पर
राहुल के,
उभरी,पीड़ा की
रेखाएं,
वारिज-नील-नयनों में
जल भर आये.
राहुल को निज आलिंगन
में भरकर,
उसके शीश पर, उसने
निज पीत कपोल रखे.
बंद पलकों से अविरल
मौन अश्रु झरे.
बोली मन ही मन.
कब से चली आ रही यह
अटूट व्यथा-यात्रा निसंग.
हर स्वांसों में
बढ़ता जाता है, रिसती पीड़ा का प्रगाढ़ रंग.
इस यात्रा में-
जितने भी पर्वत, पत्थर,
पाषाण मिले.
विदीर्ण कर उनका
अंतर.
अनगनत झरने बेमेल
बहे.
या मिले कहीं गले,
किसी नदी, नद, सरिता
से,
या उनके, कल कोमल,
कान्त कलेवर,
सैकत वन की ज्वाला
में,
छीज-छीज, तड़प-तड़प,
निराधार जले.
एक यही अश्रु झर.
देख रहा मौन.
विरह ज्वाला के
असह्य अंतिम प्रहर.
व्यथा का अविराम
छलकता हलाहल
कब कभी भी, त्याग
पाया,
इस व्यथा विगलित,
कातर मन का,
एक भी पल.
आह.
पीड़ा अदम्य गहन.
हर जीवन चषक में
इसका जहर.
गिरता रहा अविराम
ढल.
मन. विवश विकल बंदी,
वेदना-शुक्ति में रहा पल.
नयन, अविरल अश्रु
छल-छल.
स्मृतियों की, पावस
वर्षा सघन,
टीसों की,तडपती तड़ित
की असह्य तपन.
शीतल कर न पाया, उसे
अब तक
आलोड़ित उबलता,
उमडता, बहता यह निसृत नयन जल.
वेदना.
आह के धागों में
पिरोती नखत-कातर-विक्षिप्त-मन.
कहाँ अब.मनः-आकाश पर
स्नेहिल शीतल सजल घन.
आषाओं के ज्वलित
ध्वस्त अवशेषों के, धुंध में,
खोजती विकल चेतना.
कहाँ वह.
जो मानस गगन में
खिला था.
पूर्ण चन्द्र सा,
सौभाग्य स्वप्न बन.
यही जीवन. विकल
जीवन.
सुत !
तू त्याग गया जिस
दिन से.
कितनी अपलक रातें
डूब गयी,
गोपा की, मौन बनी
आँखों में.
निश्चल निर्वात रहा
नयन अम्बुध.
रही न रंचक तन-मन की
सुध.
कोई तिथि ऐसी नहीं
बीती जो,
बिना, पूजन, अर्चन
दीपाराधन के गयी हो रीती.
वृक्षों के यक्ष
देवता. किन्नर, गन्धर्व,
वेणु-वृक्ष झुरमुट,
बट, कदली, रसाल.
कहाँ नहीं अंचल डाल,
उसने शीश नवाया.
गृह देवता, ग्राम
देवता, वीथी, पनघट, सरित, बावली-तट,
चौरस्तों में, गहन
क्षपा की काली रातों में,
उसने,
आतुर,प्रतीक्षाकुल, पूजित, दीप जलाया.
क्वांर माह के जले
आकाश दीप.
वैशाख माह में,
तुलसी चौरे के समीप,
उसके, अश्रु दीप
जले.
जहां हो प्रिय.
सुखी रहें.
राहों में कोई विघ्न
कदापि न मिले.
रोते-रोते मूक अश्रु
निसृत करते,
उसके
वेदना-विदग्ध-विकल-विह्वल दिन बीते.
घायल मन अति
निक्षिप्त क्लान्त है,
अहर्निशी स्मृतियों
की जीर्ण-शीर्ण कन्था, सीते सीते.
तू.
करुणा का सागर है.
विश्व प्रेम का आगर
है.
तू बीतराग. तथागत.
चुल्ल भद्दिका का,
जुही-सुगंध-आमंत्रण
का भी किया,
दूर से ही सहर्ष
स्वागत.
समस्त आवरण.
हुए निरावरण.
फिर क्यों नहीं दिखी,
तुझे,
गोपा.
समदृष्टि में कैसा
यह व्यवधान.
हुए तुम.
क्यों इस प्रकार मौन
अनजान.
व्यथा.
पीड़ा.
क्या यह उसकी नहीं.
इस अप्रत्याशित
अदृष्ट दण्ड की,
क्या कहीं भी वह
किंचित भी,
भागी रही ?
पुरुष !
कोमल है.
अंतिम सीमा तक,
कुचला जाता है.
फिर भी,वह कभी पत्थर
तो नहीं हो जाता है.
यह.
कैसा प्रेम.
कैसी करुणा. कैसी
कोमलता है.
एक ओर कठिन परुश्ता,
दूसरी ओर अति ऋजुता,
मसृणता है.
यदि है. तो सर्वत्र
उजाला है.
अन्धकार. यदि है.
तो, सर्वत्र अँधेरा
है.
एक ही स्थान पर,
कहीं प्रकाश.
कहीं अन्धकार नहीं
होता.
यह.
कठोरता, कोमलता का
कैसा मिश्रण है.
कोई सुखी.
कोई महा विकल है.
वह नवजात शिशु,
जिसके जन्म पर,
तुमने, राहू नाम
दिया.
वह बालक राहू से
राहुल हुआ.
उसकी भी भोली
आँखें,, विचार मग्न अश्रुल हैं.
की थी पंडितों ने
भविष्यवाणी.
होगा.
विवृत कपाट बुद्ध.
या, चकवर्ती नरेश.
क्यों न हुआ तू
सम्राट.
मिला न होता,
पीड़ा का क्षेत्र,
यों विस्तृत विशाल, विराट.
भरी न रहती अंतर में
अनवरत,
सतत टीसती यह व्यथा
अशेष.
अब रहा है क्या.
शेष रही, यही पीड़ा
की
अविच्छिन्न अविराम
अथक, करुण कहानी.
कैसी यह.
अटूट मर्मान्तक
अनजानी.
सुत !
संवेदना ! एक पक्षीय
नहीं.
आकाश-स्नात-ज्योत्सना,
कहाँ नहीं.
पावन गंगा अध्वगा.
जब भी उद्भूत हुई.
धरा गगन सर्वत्र
बही.
उसने भी, स्थान
विशेष, नहीं चुना.
जो भी आया, उसकी
छाया में,
शीतल शुचि जलपान
मिला.
इतना जो कुछ भी, मन
में आया,
कहा गौतमी ने.
पर जिसके प्रति थी
इतने बोल.
वह रहा ध्यानमग्न
समाधिस्थ अचल, अबोल.
रोयी प्रजापति माता.
हा सुत ! यह ह्रदय
नहीं सम्भाला जाता.
काँप रहा मेरा
तन-मन.
बोल ! बोल ! कुछ तो
बोल.
मेरे अबोल. जीवनधन.
किस प्रकार यहाँ,
इसी शिला पर, रख दूँ,
मैं आकुल उद्वेलित
धड़कन.
क्या नहीं आँखें
खोलेगा तू.
पल नहीं एक बोलेगा
तू.
नहीं, कोई भी
सन्देश.
गाँठ बंधी मिली,
यही,
मन में कौंधती टीसती
पीड़ा अशेष.
आँचल में यह उपहार,
लेकर मैं जाऊंगी.
वहाँ.
अश्रु-सिक्त, उदास
आँखों को,
पीत विवर्ण पड़े विषण्ण विगलित, जल्जातों को,
अनवरत
अहर्निशी जगे आकुल प्रतीक्षित, प्रहरों को,
दिन-रातों को,
क्या उत्तर दूँगी.
यही की,
कंथक नहीं ला सका,
तो प्राण त्याग चला गया.
मैं अभागिनी. कंथक
से भी मेरे भाग्य कहाँ.
उससे भी गयी बीती.
वृक्ष के नीचे
अवस्थित,प्रभु की,
की, उसने घूम कर
प्रदक्षिणा.
शीश से नख तक अवलोक
कर,
बोली हताश –
आह ! प्रभु की
संरचना.
यह काषाय वसन, यह
रिक्त चरण.
कंटक शूलों का यह
कांतर वन.
शूलों में बिंधा,
तड़प रहा मेरा एकाकी आकुल मन.
यह कंचन वर्ण,
उद्दीप्त प्रभापूर्ण कर्ण.
सीधा खड़ा पृष्ट भाग.
ग्रीवा पर बिखरे
रुक्ष केशरी अलक जाल.
दीपित, स्वर्ण
विकीर्णित किंजल्क जाल.
दिए, इन चरणों में,
मैंने, निज समस्त अस्त्र डाल.
जिसे, निज गोद में
खिलाया,
नाना प्रकार से,
उसका, अपना, मन बहलाया.
आज. वह.
निज गरिमा में अति
महान, बन आया.
उसे, स्पर्श करते
भी, मन भय खाता है.
वह. इन खुली आतुर
बाहों से,
सब प्रकार अति दूर
अगम्य दुर्लभ हुआ, जाता है.
हूँ.
समीप, पर कितनी दूरी
है.
यह समस्त विलाप.रहा,
उन्मत्त आलाप.
एक शब्द भी, कर्ण
गोचर हुए न उसके तक,
कैसी यह मजबूरी है,
यह.
अनावृत. माया
रहित.
मैं.
स्पृहाओं के जटिल
जाल संकुलित.
वह. अचल अडिग.
मैं. पल पल विचलित.
चल विचल परिवर्तित.
असफल. यह मिलन.
नहीं कदापि संभावित.
वह. आकाश कुसुम.
मैं. धरा अधम.
केवल.
प्रकृति-प्रहार-परिवर्तन.
प्राप्त,
ह्रदय-मंथन.
त्याग कर समस्त आशा,
निरख रही.
आप्लावित नयन
नीलाम्बुध में, ध्वस्त हो रहे,
टूट टूटकर नींव
जमाये, गहरे विश्वास.
मौन जड़ बनी,प्रजापति
निश्चल खड़ी रही.
अवश उस, वणिक सरिस,
मुक्ता मणियों भरी,
जिसकी नौका, बीच
भंवर में घूर्णित, बलखाती डूब रही.
निज, अश्रु सरिता के
तट पर उद्वेलित करुणा विगलित,
अश्रु विमुन्चित
करती,
वह गहन उसांसे भरती
रही.
उधर, कपिलवस्तु.
इधर. कजंगल का विरल
जटिल जंगल.
मध्य पड़ा ह्रदय.
अश्रु स्नात अविरल.
सोच रही थी मन ही
मन.
समय परिस्थितियाँ
कितनी द्वंद्वात्मक मारक हो जाती हैं.
मानव.
करे कितना भी
उपक्रम.
वे अचल शिला बन जाती
हैं.
किंकर्तव्यविमूढ़ .
स्वयं निज का व्यंग
बनी,
एक अन्तरवर्हि,
समस्या-विद्ध, विडम्बना सी,
थी मूक खड़ी, उस
निर्जन वन में.
दोनों कर
अन्जलिबद्ध, अश्रु स्नात मुख, पलकें बंद.
शुष्क आकुंचित पीड़ित
कम्पित अधर,
नमित शीश तन-मन आवेग
प्रवाह थर-थर.
अस्फुट टूटे स्वर,
अधरों पर रहे बिखर-बिखर,
साक्षात्, करुणा की
प्रतिमा.
माँ की, वात्सल्यता
की चर्मोत्कर्षित उदभासित,
प्रखर प्रकाशित,
गरिमा.
कर रही थी, अश्रुओं
से प्रकृति का अभिषेक.
भर ह्रदय में व्यथा
अशेष.
वह प्रार्थना.
जो. स्वस्तिमय
अनुराग राग से पूरित.
रोली सी थी वनस्थाली
में झरित.
बोली आकुल अन्तर में
भर मर्माहत क्रंदन.
नमित तव पावन चरणों
में, सबके शत-शत वंदन.
कर रही मैं, अश्रु
अर्चन.
हे ! अपार नील गगन.
हे तारक गण. हे !
ज्योति प्राण.
उज्जवल प्रकाश
विकीर्णित दिनकर.
हे ! नक्षत्रगण.
दशों दिशाओं. दिग् दिगंत.
हे ! निशिकर.
राकापति अमृत-निसृत-अनन्त,
हे ! शीतल, मंद,
मृदु, तीव्र, ज्वलित समीर, पवन. प्रबल प्रभंजन.
नाम-संतरित,
चित्र-विचित्र सजल श्याम, जलद घन.
हे ! देवलोक के
समस्त देवगण.
हे ! देवराज मघवा
पदलत नमित प्रक्षुणित
मसृण हरित तुहिन
खचित, कल कोमल दूर्वा.
हे ! पयोदनी. कल कल
निनादिनी, अनाम प्रवाहित,
नदी नाद सरि
कुल्यायें जल प्रपात पुष्करणी.
स्वच्छ जलजात
खचित,नील तड़ाग.
हे ! यक्ष, किन्नर, गन्धर्व.
वन देवता.
तुम सबको समर्पित
यह.
अति पीड़ित करुणा
विगलित, ह्रदय धन.
हे ! वृक्ष देव.
गुल्म लता.
संग्रह करना अभिनव
सरस मधुर फलफूल.
कभी न जाना भूल.
भरना यह रिक्त पिंडपात्र.
यह मेरा धडकता ह्रदय
एकमात्र.
सदा देना पल्लव
प्रच्छायित हरित शीतल छाया,
हो न कभी, श्रांत
क्लान्त, यह.
कल कोमल कंचन काया.
हे ! पुष्प पत्रों
से आवृत्त सुरभित, वन वीथियों.
जिस पथ चले कुमार.
तुम.
सुरभित पुष्प बिछा
देना.
हो, जितने भी कंटक
शूल कंकड पत्थर,
अंचल की ओट, छिपा
लेना.
सघन अंगारक तरु की
छाया में यह.
समाधिस्थ एकाग्र है
पद्मासन में.
स्वयंप्रभा
प्रकाशित,
स्वर्ण किंजल्क जाल.
उदित नील नभ में,
स्वर्णिम अंशुमाल.
घूम रहे.
वल्कल वसन, आदिवासी,
वनवासी,
निश्चल भोले भाले
अति विश्वासी.
सरल स्नेह समझते
हैं.
शबरी के मीठे फल
रखते हैं.
करते ह्रदय से
उन्मुक्त दान.
देता जो इनको,
किंचित सम्मान.
केवल.
स्पष्ट ह्रदय के
दर्पण हैं.
पारदर्शी स्वच्छ सरल
मन हैं.
हे ! वनवासी.
तुमको सौंप, यहाँ
मैं जाती.
जिस प्रकार भ्रमर
गुंजन करता है.
शतदल का, अभिनन्दन
करता है.
ग्रहण करना.
तुम सब.
ज्ञान-सुधा-सुरभि का
आस्वादन.
समीप ही करते रहना
विचरण.
पुनः शीश झुकाकर मैं
नमित तुम सबको,
रखना संभाल कर मेरे
जीवनधन को,
इस, नैसर्गिक
सौंदर्य सौष्ठव को
रमणीय कोमल
ह्रदय-मंजूषा में.
इस, अलभ्य मणि को,
संभाल कर रख लेना.
हे दिवस ! न उष्म, न
ग्रीष्म की, ज्वाला देना,
यदि हो भी ऐसा
पावस को सादर यहाँ
बुला लेना.
हे रात्रि ! गहन
अन्धाकार लेकर.
मत तुम यहाँ कभी
आना.
आँचल में चन्दा का
दीपक लेकर
पथ में आगे आगे
जाना.
सब भांति सब प्रकार किया
तुमको,
अपना जीवन-मन-प्राण,
समर्पित,
इसी शिला में,कांतर
वन में,
मैं त्याग चली अपना
आकुल अंतर.
इस एकाकी निसंग सूने
विजन वन में
खो गया, मेरा जीवन
धन.
तुम सबको सौंप सहेज.
मैं जा रही अन्तर
में भर पीड़ा अशेष.
केवल तुम सबका स्नेह
आश्वासन ही,
मेरा पाथेय.
यही प्राप्त,
इह-जीवन-श्रेय.

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