कपिलवस्तु के राज उद्द्यान में,
चला जा रहा था राहुल.
पकड़ शारिपुत्र के कर,
कर रहा था बाल सुलभ, प्रश्न बहुल.
चंचल चपल पग,
निश्च्छल मुक्ताभ-कुशाग्र-बुद्धि,
प्रभासित नयन.
निरख रहा था सर्वत्र.
हरित तुहिन खचित नवल दूर्वादल.
पग पड़ते ही,
थे तुहिन खचित कुशाग्र दूर्वा से, जाते थे सिहर-सिहर.
नवजात मृगशावक सा कुलांचे भर रहा,
बोला पिता क्या देय मुझे देंगे.
क्या वे सहर्ष मुझे अपना लेंगे,
अन्य पिताओं की भांति ह्रदय लगा लेंगे.
मुझे तात के समीप जाना है,
बहुत कुछ उनसे कहना है.
निरख तथागत की भव्य दीप्ति,
क्षण रहा स्तब्ध चित्र-लिखित.
जो कुछ गोपा ने समझाया था,
सब हो आया विस्मृत.
बोला- बड़ी ही शीतालदायक है
प्रभु की छाया.
बालक को दृष्टि उठाकर पभु ने देखा.
जिसे सात दिवस का छोड़ आये थे,
था सम्मुख, वह,
पूर्ण चन्द्र प्रभा की दुग्ध धवल रेखा
सद्दः विकसित अवदात कमल.
सम्मोहन का रूप विमल.
उसे नाम दिया था, जन्म सुनते ही,
राहु !
वही था यह राहुल.
आसन से निज उठते-उठते,
दी आज्ञा,
प्रव्रजित इसे करो.
अब भी खड़ा रहा चकित सस्मित.
किंचित हंसा खुले प्रवाल अधर.
पूर्ण चन्द्र चषक से,
अजस्र मौक्तिक ढलक झरा.
वह.
मृदुल कोमल नवनीत सरिस सुकुमार.
गोपा के कान्तर अंतर का,
मर्माहात आकुल शुचि दुलार.
मोद्ग्गल्यान ने उसके कर को पकड़ा.
सहसा उसने फिर पूछा-
पिता मुझे क्या देंगे.
बोले शारिपुत्र-
पिता मात्र प्रव्रजित करने के,
और दे ही क्या सकते हैं.
यही एक धन है, उनके पास,
उसे प्राप्त करने का करो प्रयास.
मुख उठाकर पल भर उसने,
शारिपुत्र को देखा.
प्रातः समीर से लहराए उसके,
सुरभित सुविन्यस्त कृष्ण अलक जाल.
मानस मोती चुगने,
उड़ कर आया था नवजात राजमराल.
प्रभु के चरणों पर नत-प्रणत अंजलिबद्ध
सात वर्षों का राहुल.
महत् आत्म-ज्योति में,
मसृण शीतल किरण हो रही थी,
आत्मसात समाहित.
संकेत किया प्रभु ने मोद्ग्गल्यान को,
उसने, राहुल के शीश के काटे,
लहराते, कृष्ण चिकुर.
यह वही चिकुर थे
जिन्हें माता अक्षत हरित दूर्वा के साथ,
उपनयन संस्कार के संग,
लेती निज अंजलि में भर.
आज वे.
बिना यज्ञ और मन्त्रों के,
गिर रहे थे धरा पर कट-कट कर.
नहीं, आमंत्रित थे याज्ञिक.
नहीं, कोई भी समारोह.
यह. विछोह ! अंतिम विछोह !
सन्यस्त हो रहा था.
भावी कर्णधार.
अंतिम वंशधर.
त्याग समस्त स्नेह सौख्य संसार.
हो रहा था बंद शाक्य-कुल का
अंतिम अध्याय.
सघन नीरवता थी.
होनी, मौन बनी निरख रही थी.
नहीं, कहीं से प्रत्यावाय.
सुनकर यह सूचना.
हा ! हा ! कर उठा गोपा का
आर्त ह्रदय असहाय.
समस्त अभूष्ण अलंकार
अमूल्य स्वर्ण खचित राजकीय वसन.
सुसज्जित किया था जिसे जान,
अमोह अजेय सम्मोहन.
वह कमनीय रूप. बाँध न सका,
पिता को,
अपितु वे समस्त राजकीय श्रृंगार वसन,
अपमानित से धरा पर पड़े रहे
कर रहे थे निदारूण आत्म दोहन.
कहाँ केयूर, कहाँ वलय, कहाँ कंठहार,
बंधे कटि पर मौक्तिक गुच्छ खचित
स्वर्णिम कटिबंध.
अवनि पर बिखरे छिटके थे.
सुना.
शुद्धोधन ने जब,
राहुल भी प्रव्रजित हो गया.
जहां खड़ा रहा उसी स्थल पर,
वह, वज्र-प्रहार-प्रताड़ित-जडित, हो गया.
वह. हा ! कर उठा वक्ष पर, रख दोनों हाथ.
जब विपत्ति रौद्र रूप लेकर आती है,
तब भला देता है कौन साथ.
आँखों के दीपित अश्रु-दीप में,
राहुल सप्त रंग किरण बन उतरा.
उसे देख कर यह जीवन.
स्वांस खीचता था बढ़ा चला.
किन्तु वे आशाओं के सुरधनु के,
एक-एक रंग.
नैराश्य धन में टूट-टूट विलीन हुए.
कंकाल सदृश खड़ा रंगहीन म्लान
आशाओं का इंद्र-चाप.
अनगनत तीक्ष्ण शूलों सा चुभ,
दे रहा था मन को दारूण संताप.
आह प्रारब्ध.
इस शुष्क ज्वलित सैकत वन में,
ज्वाल फेंकते,
तीव्र प्रभंजन ही सदा चले.
कभीं न,
पीड़ा के लहराते श्यामल अम्बुध से,
झुक, झूम बरसते सरस सघन घन के
इन्द्रधनुष गले मिले.
या. परित्यक्ता, उपेक्षिता,
तिरस्कृता बंजर धरती.
केवल नागफनी, बबूल के कांटे ही, यहाँ झरे.
क्षण आह भरकर थमा, शुद्धोधन.
संभव है उसे सुनने का भ्रम हो.
नन्द गया.
कोई कारण नहीं,
राहुल बालक भी प्रव्रजित हो.
आकुल हो क्षिप्र गति से,
चला, न्यग्रोध आराम की और,
पहुंचते ही पड़ी दृष्टि जहां,
अवस्थित थे बीतराग, नन्द और राहुल,
धारण कर काषाय वसन, चीवर.
विस्फारित आँखों में उमड़ा विषाद घोर.
स्तब्ध देखता, रहा, नृप.
किस अपराध का यह दारूण, दंड.
नहीं जिसका आदि अंत कोई छोर.
उठी ह्रदय में आंधी.
आँखों के सम्मुख ध्वांत आकाश, मिला.
कम्पित तन. डगमग, पग.
ह्रदय तीव्र प्रभंजन में आमूल गिरा.
किसी बेहोशी में आकर
वह प्रभु के सम्मुख खड़ा हुआ.
श्मशान-सेवी प्रेतात्मा सा,
धूल धूसरित विक्षप्त बना.
एक बार वहीं से घूम कर देख.
दृष्टि थमी.
जिस स्थल पर कटे कृष्ण वर्तुल चिकुर पड़े थे.
अलंकार और वसन बिखरे थे.
बोले.
अत्यंत पीड़ित किन्तु सरोष.
सिद्धार्थ !
उस दिन अत्यंत विवश निज को जाना था,
जिस दिन, तुमने बिना सूचना दिए,
यह गृह त्यागा था.
नियति प्रहार जानकर,
विकल आर्त ह्रदय रोया.
मुझ सा नहीं, कोई अन्य अभागा था.
किन्तु. आज.
आज. तुमने. मुझको निष्प्राण किया है.
मेरी गरिमामयी वंश परम्परा को,
निर्ममता से आमूल उखाड़ दिया है.
यह मेरी धरोहर. मेरी थाति.
वंश-सयंदन का अंतिम सारथि.
पिता,
पुत्र का विवाह इसलिए नहीं करता कि,
पौत्र, उसके आत्मज का पुत्र है.
वह तो, अपनी पहचान और
अक्षुण्ण जीवन क्रम का, मात्र, सूत्र है.
तुमने व्यतिक्रम किया,
व्यवधान स्थापित किया.
यह सदियों का इतिहास.
यहीं विराम पा जाएगा.
अब, न, रहेगा कोई, हव्य कव्य का होता.
न, तिल-जल-तर्पण देने वाला.
स्वर्ग-गत सब पृत,
तृषित, क्षुधित, रह जायेंगे.
बिना यज्ञ, भक्षण करने वाले,
सब अनार्य ही रह जायेंगे.
क्यों नहीं ली, मुझसे अनुमति.
मैं. उसका पितामह.
निज वंशधर का संरक्षक हूँ.
यह जन्म.
एक सामाजिक संपत्ति है,
इसपर व्यकित-विशेष का अधिकार नहीं.
देखो रंचक. कितना है यह सुकुमार.
वात्सल्य-स्नेह-सरोवर में खिला
विहँसता नवजलजात.
यह अप्रत्याशित दारूण दैव प्रहार.
प्रव्रज्या.
निर्दय, निदाध-दग्ध-दाह. वज्र-निपात.
सात वर्षीय, कल कोमल कान्चनेय,
कान्त कलेवर. नव प्ररोहित पंख,
चल चंचल स्कन्ध.
असमर्थ उड्डयन आरोह.
यह कठिन कठोर दुद्धर्ष रुक्ष काषाय वसन.
कैसे कर पायेगा यह गहन भार अहन.
मारा है.
अनजाने में मुझे कुठाव.
यह अजर अमर टीसता अनवरत पीड़ित घाव.
पूछेगा जब कभी, भविष्य.
बताएगा कौन. कहाँ था मेरा गाँव.
किंचित भी दिया नहीं ध्यान.
वंश का यह दीपित प्रतिभासित प्रतिमान.
स्नेह-वारि में धूम मचाता,
कल्पनाओं के सुरधनु में खेल रचाता.
कभी घर-बाहर, कभी माँ का स्नेहिल आँचल. इतना ही था
बाल क्रीडा कौतुक कौतुहल का संसार.
यह अल्हड निश्च्छल भोला बचपन.
सम्पूर्ण विश्व-प्रतिबिम्बित निर्मल दर्पण.
चूर्ण-चूर्ण किया तुमने.
देकर, निदारूण कुलिश कठोर
प्रव्रज्या कुठारघात.
देखो ! कितना अल्प है वय.
यह प्रव्रज्या कठोर निर्दय.
नहीं अभी उसने.
निज माता का स्नेहिल आँचल त्यागा.
नहीं, मधुर सपनों में सोता,
वह, अब तक जागा.
बाल चापल्य में, उच्चरित शब्द भी,
अलसाए से हैं.
मातृत्व मधु में डूबे,
लड़खड़ाते, बल, खाए से हैं.
कोमल तुहिनों से भी, वह विक्षुब्ध हो जाता.
भींगी दूर्वा पर पंजों के बल
चलता इठलाता है.
यह हर्म्य.
उसका यह मर्म,
इसके मधुर कलरव से गुंजित.
इसे देख कर,
सब इसमें ही भूले और भ्रमित.
जिस दिन तुम गए.
समय ही जैसे ठहर गया था.
शिराओं का चलता रक्त
क्लांत हो गया था.
नन्द गया.
उसे भी देवप्रहार समझ कर झेला.
किन्तु.
देखो. यह जर्जर शरीर.
यह सिक्त धवल केश.
इस वृद्धावस्था में
यह व्यथा अवर्ण्य अशेष.
इन अस्थियों से, माँस भी साथ छोड़ रहा.
हर हांफती साँसों में,
ह्रदय आन्वें सा दग्ध हो रहा है.
हर शुष्क सिकुड़ी नसों में,
रक्त, न उष्ण है. न शीतल है.
तुम्हारे विछोह में जो दर्द
इनमें गर्म पिघले सीसे सा दौड़ रहा था.
काँटों सा रिसता था.
वह अब.
हिम-नद, सा जम गया है.
दर्द.
कांटो सा गड़ गया है.
कोई गतिमान नहीं.
दोनों अक्षुण्ण और चिरन्तन है.
जो नहीं देखने योग्य था.
सब मैंने देखा.
मेरा कंठ.
अंतर-दाह से शुष्क हो रहा है.
मैं पतझार के सूखे नीरस पीले पात्र सा,
मन की भयंकर आंधी में,
ठोकरें और चोटें खाता,
दिशा-विहीन अति दीन,
भटक रहा हूँ.
सिद्धार्थ !
जिस ज़रा को दूर करने का प्रयत्न किया.
उसे देखो.
वह कितना असहाय निराधार,
निसंग और पीड़ाजनक है.
इसके कष्टों को,
तुमने बढाया, घटाया नहीं.
इस शून्य में.
यह प्रेतात्मा. क्या करेगी,
सिद्धार्थ ! क्या करेगी.
यदि.
मृत्यु का कोई और दिन रहा होता.
तो संभव है.
वह. आज यहीं खड़ी है.
ये सब जीवन के नहीं,
मृत्यु के प्रहरी हैं.
एक प्रश्न का उत्तर दो.
क्या प्रव्रज्या ही एकमात्र निवृत्ति है ?
जो इसके प्रति एश्नाएं त्याग
संकल्पित और समर्पित है,
शोभित उसे ही यह है विधान.
अन्यथा. बल खाती लहराती स्पृहायें.
पावस की वेगवती सरिताएं.
क्या करेंगे
ये पिण्ड पात्र, चीवर, काषाय वसन.
देखो सम्मुख.
जबरन सन्यस्त किया गया, नन्द,
अभी भी इसकी खाली आँखों में,
भर रहा, नैराश्य, ध्वांत, धूम फेंकता
कितना है , यह मन ही मन अशांत.
यह तो, वज्रपात है.
जो मन से हुआ नहीं विरागी,
कैसे होगा वह त्यागी.
मात्र इच्छा शक्ति,
लाती है विरक्ति.
यह सम्पूर्ण संसृति
कभी श्मशान नहीं हो सकती.
प्रकृति के अनुशासित विधानों में,
विश्रृंखलता, नहीं आती.
नहीं जानती प्रकृति, गति-रोध.
अकृत्रिमता लाएगी अवरोध.
मानव.
स्वयं में कुछ नहीं.
वह मात्र, प्रकृति का अंग है.
यदि होंगे उसके नियम भंग,
निश्चय लेगी वह प्रतिरोध.
चाह कर भी, कोई शक्ति,
नहीं सकेगी उसे रोक.
ये. सन्यस्त मुंडित-शीश. भिक्षु.
प्रकृति-विक्षुब्ध.
वृक्षों की छाया में अवस्थित हैं, ध्यानस्थ.
क्या ये सभी तन-मन से हैं स्वस्थ.
यह अकर्मण्यता.
देश की सुरक्षा विनाशोन्मुख है.
जब देश को आवश्यकता होगी.
न राजा, न राजनीतिज्ञ, न व्यवस्था,
और न अनुशासनशीलता रहेगी.
आततायी शत्रुओं से,
भूमि, पराजित कुचली जायेगी.
अतः किसी को भी,
प्रव्रजित करने से पूर्व
अभिभावकों, उसके संरक्षकों
तथा उसकी इच्छा शक्ति जानो.
अनुमति ले लो.
एक पक्षीय विचारधारा,
असंतुलन ही लाएगी.
समय जो चलता है अविराम,
निरंतर उसके भी दो पक्ष.
वह भी निज राज्य व्यवस्था करता है.
सौर-चक्र, नक्षत्र, ऋतुएं, संवत, वर्ष, अयन,
सबको, एकत्रित करता है.
अतः आन्तर प्रकृति नहीं,
वाह्य प्रकृति भी अपेक्षित है.
दोनों के सम्मिलन के संतुलन से ही
मार्ग सुरक्षित है.
असंतुलित विचार या विधान,
कदापि न प्राप्त कर सकेंगे,
कान्क्षित अभीष्ट,
जो मानव से सतत अपेक्षित है.
अविनश्वर और नश्वर की समय-तुला पर
जीवन-बाट चढ़ा.
निष्कंप तीली पर अचल
उसका चक्षु गड़ा.
सम्यक संतुलन पर वह खरा उतर रहा.
पंकिल में निर्मल कंज और
शुक्ति में मौक्तिक प्रभा.
कोयले में हीरा,
क्षपा में मयंक-दीप जला.
समय-श्येन भी निज
कृष्ण और श्वेत पक्ष लेकर उड़ा.
न कभी शाश्वत रात्रि या
शाश्वत दिवस रहा.
विदेह कहाँ गया, मिथिला-अधिप जनक,
जो ऐश्वर्य में पल कर भी
नितांत विरागी रहा.
सोचो इसे.
सिद्धार्थ !
एक पक्ष का खग.
कभी न उड़ान भर सका.
आज !
सृष्टि से तुमने काटा है
मेरा हरा-भरा खेत तैयार खड़ा.
तुम्हारी इस अव्यवहारिकता को,
समय को,
उत्तर देना होगा.
अमिय-गरल दोनों का मंथन कर,
जीवन तथ्य बिलोना होगा.

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